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किशनगंज में दीपावली-छठ पर कुम्हारों के चाक ने पकड़ी रफ्तार, साल में महज 20-25 दिन ही मिलता है रोजगार

Published: Sat, 31 Oct 2026 03:48 PM (IST)

दीपावली और छठ महापर्व नजदीक आते ही किशनगंज के कुम्हार परिवार मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने में जुट गए ...और पढ़ें

कुम्हारों के चाक ने पकड़ी रफ्तार

कुम्हारों के चाक ने पकड़ी रफ्तार

HighLights

  1. दीपावली-छठ के लिए कुम्हारों ने दीये बनाने तेज किए।

  2. आधुनिक लाइटों से पारंपरिक दीयों की मांग पर असर।

  3. कारीगरों को इस बार अच्छी बिक्री की उम्मीद है।

संवाद सूत्र, बहादुरगंज (किशनगंज)। आधुनिकता की चकाचौंध भले ही दीपावली की रोशनी का अंदाज बदल रही हो, लेकिन मिट्टी के दीयों का पारंपरिक महत्व आज भी बरकरार है। दीपावली और छठ महापर्व नजदीक आते ही कुम्हार परिवारों के चाक की रफ्तार तेज हो गई है। 

घरों में दिन-रात मिट्टी के दीये, कलश और पर्व में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक बर्तन तैयार किए जा रहे हैं। कारीगरों को उम्मीद है कि इस बार बाजार में अच्छी मांग रहेगी और उनकी मेहनत को उचित कीमत मिलेगी।

दीपावली को लेकर बहादुरगंज के चौक-चौराहों और बाजारों में मिट्टी के दीयों की दुकानें सजने लगी हैं। सर्रा पुल स्थित कुम्हार टोली में बलदेव पंडित, शंकर पंडित सहित अन्य कारीगर अपने पुश्तैनी कारोबार को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। 

सालभर में महज 20 से 25 दिन ही रोजगार

उनका कहना है कि सजावटी लाइट, ट्यूनिंग बल्ब और बिजली से चलने वाली झालरों के बढ़ते चलन ने मिट्टी के दीयों की मांग पर असर डाला है। 

नतीजा यह है कि कुम्हार परिवारों को सालभर में महज 20 से 25 दिन ही इस कारोबार से रोजगार मिल पाता है। बाकी दिनों में परिवार चलाने के लिए मजदूरी और दूसरे काम करने पड़ते हैं।

घर-घर जाकर दीये और मिट्टी के अन्य सामान बेच रहे

कारीगर बलदेव पंडित बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले चीन निर्मित झालरों और सजावटी सामानों के बहिष्कार की मुहिम से कुम्हार समाज को अपने पारंपरिक कारोबार के फिर से फलने-फूलने की उम्मीद जगी थी। 

हालांकि, इस वर्ष बाजार की स्थिति अब तक उम्मीद के मुताबिक नहीं है। इसके बावजूद कारीगरों ने हिम्मत नहीं छोड़ी है। अपनी पुश्तैनी कला और परंपरा को बचाए रखने के लिए वे बाजार में दुकान लगाने के साथ गांव-देहात में घर-घर जाकर दीये और मिट्टी के अन्य सामान बेच रहे हैं।

दूसरी ओर, खरीदारों का कहना है कि मिट्टी के दीये और पारंपरिक बर्तनों की कीमतों में पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि हुई है। महंगाई के कारण लोग जरूरत के हिसाब से ही खरीदारी कर रहे हैं। हालांकि, पूजा-पाठ और दीपावली की परंपरा निभाने के लिए मिट्टी के दीयों की खरीदारी को जरूरी मान रहे हैं।

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