कटिहार में पनामा विल्ट ने बर्बाद की केले की खेती, थाईलैंड व चेन्नई के वैज्ञानिक पहुंचे, दिल्ली-नेपाल तक जाती थी फसल
Katihar Falka Banana Farming Panama Wilt Disease: कटिहार के फलका प्रखंड में पनामा विल्ट बीमारी ने केले की खेती को ...और पढ़ें

Katihar Falka Banana Farming Panama Wilt Disease: कटिहार में केले की खेती
HighLights
पनामा विल्ट ने कटिहार की केले की खेती बर्बाद की।
कभी दिल्ली, नेपाल तक जाता था फलका का केला।
वैज्ञानिकों के प्रयासों के बावजूद स्थायी समाधान नहीं मिला।
संवाद सूत्र, पोठिया (कटिहार)। कभी केले की उन्नत खेती और बंपर पैदावार के लिए देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाला कटिहार जिले का फलका प्रखंड आज अपनी ऐतिहासिक पहचान खोने की कगार पर पहुंच गया है। करीब एक दशक पहले तक यहां के खेतों में दूर-दूर तक केले के हरे-भरे पौधे लहलहाते थे।
देश के कोने-कोने से व्यापारियों और ट्रकों का तांता लगा रहता था। यहां का स्वादिष्ट और गुणवत्तापूर्ण केला दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों की फल मंडियों में शान से बिकता था।
केले की खेती केवल किसानों की आर्थिक समृद्धि का आधार ही नहीं थी, बल्कि हजारों खेत मजदूरों और परिवहन (ट्रांसपोर्ट) कारोबारियों की रोजी-रोटी का मुख्य जरिया भी थी। लेकिन 'पनामा विल्ट' नामक घातक फंगल बीमारी ने इस पूरे फलते-फूलते कृषि तंत्र पर ऐसा ग्रहण लगाया कि आज फलका में केले की खेती विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई है।
बीमारी के प्रकोप से साल-दर-साल घटता गया खेती का रकबा
करीब एक दशक पूर्व इस इलाके के खेतों में पनामा विल्ट बीमारी ने पहली बार दस्तक दी थी। देखते ही देखते इस संक्रामक रोग ने पूरे प्रखंड के बागानों को अपनी चपेट में ले लिया। सबसे त्रासद स्थिति यह रही कि जब फसल पूरी तरह तैयार होने के करीब पहुंचती, तभी एकाएक पौधे सूखकर मुरझाने और गिरने लगते।
-1793863226758.webp)
किसानों की महीनों की कड़ी मेहनत और प्रति बीघा लगाई गई लाखों रुपये की लागत आंखों के सामने मिट्टी में मिल जाती। लगातार आर्थिक मार झेलने के कारण किसानों का मोह इस पारंपरिक नकदी फसल से भंग होता गया। नतीजा यह हुआ कि साल-दर-साल केले का रकबा सिमटता चला गया। भारी कर्ज और घाटे के शिकार कई किसान अब केले के बजाय अपेक्षाकृत कम जोखिम वाली मक्का और गेहूं की फसलों को प्राथमिकता देने लगे हैं।
नेपाल तक थी मांग, खेती के साथ मजदूरों का रोजगार और ट्रांसपोर्ट कारोबार भी ठप
एक समय था जब फलका और समीपवर्ती कोढ़ा प्रखंड का इलाका उत्तर बिहार में केले का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था। फलका के केले की बनावट, मिठास और टिकाऊपन के कारण देश की प्रमुख मंडियों में इसका अलग दबदबा था। यहां से रोजाना दर्जनों ट्रक केला रांची, बरेली, दिल्ली, बहराइच, पंजाब, हरियाणा, मेरठ, बदायूं और बनारस के लिए रवाना होते थे।
इतना ही नहीं, खुली सीमा के रास्ते पड़ोसी देश नेपाल की मंडियों तक फलका के केले की भारी मांग रहती थी। जब तक यह कारोबार चरम पर था, स्थानीय मजदूरों को सालभर आसानी से बेहतर मजदूरी मिलती थी और ढुलाई से जुड़ा स्थानीय ट्रांसपोर्ट का धंधा भी खूब चमक रहा था। बीमारी के चलते खेती उजड़ने से न केवल किसानों की कमर टूटी, बल्कि मजदूरों से रोजी-रोटी छिन गई और ट्रांसपोर्टरों के पहिए भी थम गए।
थाईलैंड और चेन्नई से आए वैज्ञानिक, फिर भी नहीं मिला स्थायी समाधान
पनामा विल्ट के बढ़ते कहर को देखते हुए बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर के अलावा चेन्नई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थाईलैंड से भी उच्चस्तरीय कृषि वैज्ञानिकों की टीमें फलका पहुंचीं। वैज्ञानिकों ने खेतों से रोगग्रस्त पौधों, मिट्टी और कंदों (राइजोम) के नमूने जुटाए और उन्हें उच्चस्तरीय प्रयोगशालाओं में जांच के लिए ले जाया गया। किसानों को दवा के छिड़काव, कंद उपचार और खेत की जुताई से जुड़े कई तकनीकी सुझाव दिए गए, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि इस घातक बीमारी पर आज तक कोई प्रभावी या स्थायी नियंत्रण नहीं पाया जा सका।
फिलहाल, कुछ प्रगतिशील किसान कृषि वैज्ञानिकों से विशेष प्रशिक्षण लेकर 'टिशू कल्चर' तकनीक के जरिए केले की नई किस्में लगाने का जोखिम उठा रहे हैं। किसानों को उम्मीद है कि कृषि अनुसंधान से यदि पनामा विल्ट का कोई सटीक समाधान निकल आता है, तो फलका में एक बार फिर केले की खेती का वही स्वर्णिम दौर लौटेगा और क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खुशहाली की नई सुबह होगी।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।