बिहार में टमाटर की 'लाल क्रांति'! झोपड़ी की जगह पक्के मकान, बंजर व नक्सलवाद को हराकर अमेरिका-जर्मनी पढ़ने गए बच्चे
Banka Jaipur Tomato Farming Naxal Village: बांका के जयपुर क्षेत्र में टमाटर की खेती ने कभी बंजर और नक्सल प्रभावित ...और पढ़ें

Banka Jaipur Tomato Farming Naxal Village: टमाटर की बंपर कमाई से अमेरिका और जर्मनी पढ़ने जा रहे किसान के बेटे।
HighLights
नक्सल प्रभावित बंजर जयपुर क्षेत्र में टमाटर की खेती से बदलाव।
किसानों को लाखों का मुनाफा, जीवन स्तर में अभूतपूर्व सुधार।
बच्चों को उच्च शिक्षा हेतु विदेश भेजने में मिली सफलता।
जागरण संवाददाता, बांका। Banka Jaipur Tomato Farming Naxal Village: बांका जिले के नक्सल प्रभावित रहे जयपुर क्षेत्र की लाल और पथरीली माटी कभी बंजर मानी जाती थी। दशक-डेढ़ दशक पहले तक भीषण नक्सली खौफ और खेती के नाम पर नाममात्र की उत्पादकता के कारण यहाँ के अधिकांश परिवार जीविका चलाने के लिए परदेस पलायन करने को अभिशप्त थे।
लेकिन, इसी कथित लाल बंजर में टमाटर की खेती का अनोखा प्रयोग कुछ ही वर्षों में इलाके की तस्वीर और किसानों की तकदीर बदलने में मील का पत्थर साबित हो गया है।
आज टमाटर की इस 'लाल क्रांति' ने किसानों को न केवल आर्थिक रूप से समृद्ध और मजबूत बनाया है, बल्कि वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए पटना से लेकर अमेरिका और जर्मनी जैसे विकसित देशों तक भेज रहे हैं। खेतों में टमाटर की लहलहाती फसल अब नई पीढ़ी के बड़े सपनों को नए पंख दे रही है।
'काजू-किसमिस और इलायची से भी अधिक मुनाफा'
गुरुड़ा गांव के प्रगतिशील किसान सोना प्रसाद यादव बताते हैं कि टमाटर की खेती में जितना मुनाफा है, उतना शायद काजू-किसमिस और इलायची की खेती में भी नहीं। पिछले कुछ वर्षों में एक एकड़ टमाटर की फसल से किसानों को न्यूनतम एक लाख रुपये से लेकर कई लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हो रहा है।
जिनके पास पांच से दस एकड़ बंजर और पहाड़ी खेत थे, वे प्रतिवर्ष टमाटर बेचकर पांच से दस लाख रुपये तक की नकद कमाई कर रहे हैं। इस बंपर मुनाफे ने इलाके के लोगों के जीवन स्तर को पूरी तरह बदल दिया है। जहाँ कभी झोपड़ियाँ हुआ करती थीं, वहां अब बड़े पक्के मकान खड़े हो गए हैं।
पलनियां का बेटा स्टैनफोर्ड (अमरीका) में, तो कोल्हासार का दीपक जर्मनी में
इस बदलाव की कई ऐसी प्रेरक कहानियां हैं, जिन्हें सुनकर कोई भी दंग रह सकता है। पलनियां गांव के एक साधारण किसान दिनेश यादव का बेटा आज अमेरिका के विश्वप्रसिद्ध स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) से बीटेक (B.Tech) की उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा है।
इसी तरह, तितलाखो गांव के किसान ईश्वर यादव के दो बेटे (पंकज और हिमांशु) और उनकी पत्नियां पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बन चुके हैं। सरूआ गांव के प्रेम कुमार का पुत्र भी नीट (NEET) पास कर एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है। झाझा के किसान बनारसी यादव का बेटा मृत्युंजय और बहू दोनों सेंट्रल बैंक में अधिकारी हैं।
लक्ष्मीपुर के राजेंद्र साह का बेटा दीपक कुमार एमटेक करने के बाद पहले ब्रिटेन और अब जर्मनी में प्रतिष्ठित नौकरी कर रहा है। कोल्हासार के सुरेश यादव का पुत्र रंजीत पटना में गृह विभाग में सेवारत है, तो वहीं गुड्डू मंडल पटना से पढ़ाई कर भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में अफसर बन चुका है।
बंजर भूमि अब पहाड़ी इलाके के लिए बनी वरदान
स्थानीय कोल्हासार हाईस्कूल के इतिहास शिक्षक ऋषिकेश कुमार बताते हैं कि उनके पिता ने अपनी पूरी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी सिर्फ टमाटर की खेती की आमदनी से पूरी की है। टमाटर की इस फसल ने यह साबित कर दिया है कि यहां की अनुपजाऊ पहाड़ी और बंजर भूमि, समतल व पारंपरिक उपजाऊ धान-गेहूं के खेतों से कहीं अधिक मुनाफा दे सकती है। यहां के किसान अपनी बंपर कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने बच्चों को पटना, दिल्ली जैसे महानगरों में रखकर उच्च शिक्षा दिलाने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने में लगा रहे हैं।
आजीविका ही नहीं, सामाजिक और शैक्षणिक बदलाव का नया प्रतीक
जयपुर और आसपास के दर्जनों गांवों में हो रही टमाटर की व्यापक खेती अब महज आजीविका का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह क्षेत्र में आ रहे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक बदलाव की एक नई और बुलंद इबारत लिख रही है। कभी नक्सलवाद की काली छाया में रहने वाला यह इलाका आज शिक्षा और खुशहाली के नए उजाले से जगमगा रहा है, जो बिहार के कृषि क्षेत्र के लिए एक मिसाल है।
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