बांका के जलाशयों में केज कल्चर तकनीक से मत्स्य क्रांति; 4 बड़े डैम में लगे 554 फ्लोटिंग केज, सालाना 2000 टन उत्पादन का लक्ष्य
Banka Cage Culture Fish Farming: बांका जिले में 'केज कल्चर' तकनीक से मत्स्य पालन में क्रांति आ गई है, जिससे ...और पढ़ें

Banka Cage Culture Fish Farming: बांका के जलाशयों में परवान चढ़ी नीली क्रांति, 554 फ्लोटिंग केज से सालाना 2000 टन मछली उत्पादन का ढांचा तैयार
डिजिटल डेस्क, बांका। Banka Cage Culture Fish Farming: बांका जिले का प्राकृतिक जल वैभव अब केवल सिंचाई और पर्यटन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आधुनिक मत्स्य पालन के एक बड़े केंद्र के रूप में तेजी से स्थापित हो रहा है। पारंपरिक पोखरों की चारदीवारी से निकलकर मत्स्य पालन अब विशाल जलाशयों की अगाध जलराशि में वैज्ञानिक पद्धति यानी 'केज कल्चर' (फ्लोटिंग पिंजरा तकनीक) के सहारे नई ऊंचाइयों को छू रहा है।
मत्स्य संसाधन विभाग की पहल पर जिले के चार प्रमुख जलाशयों में स्थापित 554 फ्लोटिंग केज अब स्थानीय अर्थव्यवस्था और किसानों की आमदनी को नई गति दे रहे हैं।
जिले के ओढ़नी, चानन, बधुआ और बेलहरना जलाशय में इस उन्नत तकनीक का व्यवस्थित विस्तार किया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन चारों जलाशयों को मिलाकर अब तक कुल 554 केज सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इस आधुनिक बुनियादी ढांचे के दम पर जिले में सालाना करीब दो हजार टन गुणवत्तापूर्ण मछली उत्पादन की मजबूत क्षमता विकसित हो चुकी है।
बधुआ में सर्वाधिक 350 केज, वैज्ञानिक मानकों पर तैयार हुआ ढांचा
तकनीकी रूप से इन पिंजरों को गहरे पानी में सुरक्षित और संतुलित तरीके से स्थापित किया गया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा 350 केज अकेले बधुआ जलाशय में लगाए गए हैं। इसके अलावा पर्यटन मानचित्र पर उभरे ओढ़नी जलाशय में 144 केज, जबकि चानन और बेलहरना डैम में 30-30 केज स्थापित किए गए हैं।
बांका में केज कल्चर परियोजना: आंकड़ों के आईने में
चयनित प्रमुख जलाशय: 04 (बधुआ, ओढ़नी, चानन एवं बेलहरना)
कुल स्थापित केज की संख्या: 554 फ्लोटिंग केज
जलाशयवार स्थिति:
बधुआ जलाशय: 350 केज
ओढ़नी जलाशय: 144 केज
चानन जलाशय: 30 केज
बेलहरना जलाशय: 30 केज
प्रति केज मानक आकार: 9 मीटर लंबा × 4 मीटर चौड़ा × 4 मीटर गहरा
बीज संचयन क्षमता: 3,000 से 4,000 फिंगरलिंग्स प्रति केज
वार्षिक उत्पादन क्षमता: लगभग 2,000 मीट्रिक टन
इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार, प्रत्येक केज की लंबाई नौ मीटर, चौड़ाई चार मीटर और गहराई चार मीटर रखी गई है। एक केज में औसतन तीन से चार हजार उन्नत नस्ल के फिंगरलिंग्स (मत्स्य बीज) संचय किए जाते हैं। नियंत्रित वातावरण और संतुलित आहार मिलने के कारण मछलियां कम समय में तेजी से बढ़ती हैं, जिससे नुकसान की गुंजाइश न के बराबर रह जाती है।
पारंपरिक पद्धति से कई गुना अधिक मुनाफा, पालकों को विभाग का संबल
जिला मत्स्य पदाधिकारी कृष्ण कन्हैया के अनुसार, केज कल्चर तकनीक ने जिले के जल संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग को पूरी तरह बदल दिया है। पारंपरिक पोखरों की तुलना में जलाशयों के बहते व स्वच्छ जल में मछलियों की वृद्धि दर और रोग प्रतिरोधक क्षमता कहीं बेहतर होती है। इससे स्थानीय मत्स्य पालकों को कम लागत में कई गुना अधिक मुनाफा मिल रहा है।
विभाग आने वाले समय में जिले के अन्य जलस्रोतों में भी इस मॉडल को विस्तारित करने की रूपरेखा पर काम कर रहा है। इसके लिए इच्छुक किसानों और मत्स्य पालकों को आधुनिक किट, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, आवश्यक वित्तीय अनुदान और तकनीकी परामर्श निरंतर उपलब्ध कराया जा रहा है।
अंग और सीमांचल में आपूर्ति का बनेगा हब, स्थानीय रोजगार को बल
बड़े जलाशयों में केज कल्चर के सफल क्रियान्वयन से बांका जिला मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में न केवल आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है, बल्कि आसपास के अंग और सीमांचल क्षेत्रों में ताजी मछलियों की आपूर्ति का बड़ा केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर है। पानी की सतह पर तैरते ये पिंजरे न केवल जिले के ग्रामीण अर्थतंत्र को मजबूती दे रहे हैं, बल्कि स्थानीय युवाओं और पारंपरिक मछुआरों के लिए आजीविका और स्वरोजगार के नए द्वार भी खोल रहे हैं।
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