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चाइनीज झालरों ने छीनी कुम्हारों की चमक, कटिहार में दीपावली से पहले फीकी पड़ी माटी के दीये बनाने वालों की उम्मीदें

Published: Sat, 31 Oct 2026 09:55 AM (IST)

कटिहार के कुरसेला में दीपावली से पहले कुम्हारों की उम्मीदें फीकी पड़ रही हैं, क्योंकि चाइनीज झालरों और बल्बों के ...और पढ़ें

मिट्टी के दीये तैयार करते कुम्हार।

मिट्टी के दीये तैयार करते कुम्हार।

HighLights

  1. चाइनीज झालरों ने मिट्टी के दीयों की मांग घटाई।

  2. कुम्हारों की रोजी-रोटी पर गहराया गंभीर संकट।

  3. 'वोकल फॉर लोकल' से पर्यावरण और कुम्हारों को लाभ।

संवाद सूत्र, कुरसेला (कटिहार)। प्रकाश के पावन पर्व दीपावली के करीब आते ही कटिहार जिले के कुरसेला सहित आसपास के बाजारों में रंग-बिरंगी इलेक्ट्रानिक झालरों और चाइनीज बल्बों की चमक तो बढ़ने लगी है, लेकिन मिट्टी के दीये बनाकर अपनी आजीविका चलाने वाले पारंपरिक कुम्हारों की उम्मीदें लगातार फीकी पड़ रही हैं।

आधुनिक सजावट के बढ़ते अंधानुकरण ने मिट्टी के दीयों की मांग को काफी हद तक घटा दिया है, जिससे इस पुश्तैनी हुनर और कारोबार से जुड़े दर्जनों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट गहराने लगा है।

500 दीयों के एडवांस आर्डर अब बीती बातें

कुरसेला हाट में मिट्टी के दीये बेचने पहुंचे स्थानीय कारीगरों ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि कुछ साल पहले तक दीपावली से हफ्तों पहले बड़े-बड़े घरों से 500 से 1000 दीयों के एडवांस आर्डर मिल जाया करते थे।

अब स्थिति यह हो गई है कि लोग केवल पूजा की रस्म और औपचारिकता निभाने के लिए चार-पांच दीये ही खरीदते हैं और बाकी पूरे घर को चाइनीज झालरों व बिजली के बल्बों से सजा देते हैं।

दक्षिणी मुरादपुर पंचायत के तीनघड़िया गांव निवासी बलराम पंडित, अर्जुन पंडित, छोटेलाल पंडित और दिनेश पंडित का कहना है कि बढ़ती महंगाई और मिट्टी की अनुपलब्धता के कारण अब इस पुश्तैनी धंधे से परिवार का पेट पालना नामुमकिन जैसा हो गया है। मिट्टी के बर्तनों व दीयों की मांग घटने से गांव के युवा अब रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं।

पर्यावरण संरक्षण और 'वोकल फॉर लोकल' का संदेश

भारतीय संस्कृति में दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रहा है। ये माटी के दीये न केवल प्रकृति से जुड़ाव के प्रतीक हैं, बल्कि पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) भी हैं। दूसरी ओर, सस्ते और खराब होने वाले चाइनीज व इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद पर्यावरण के लिए घातक 'ई-कचरे' (E-waste) की समस्या को बढ़ा रहे हैं।

कुम्हारों ने सरकार का ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा कि जैसे रेलवे स्टेशनों पर कुल्हड़ चाय की पहल की गई थी, वैसे ही कुम्हार कला बोर्ड और मिट्टी के उत्पादों को बढ़ावा देने वाली योजनाओं को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता है।

दीपावली के इस त्यौहार पर यदि हर नागरिक ''वोकल फॉर लोकल'' की भावना को अपनाते हुए चाइनीज सामानों का बहिष्कार करे और मिट्टी के दीये खरीदे, तो न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी बल्कि इन गरीब कुम्हार परिवारों के घरों में भी खुशियों का दीया रोशन हो सकेगा।

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