औषधीय फसलों की खेती से खुलेगा आमदनी का रास्ता, आदिवासी महिलाओं के लिए पूसा कृषि विश्वविद्यालय की पहल
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, जमुई में 50 से अधिक आदिवासी महिलाओं को औषधीय पौधों की खेती और ...और पढ़ें

आदिवासी महिलाओं के साथ एक्सपर्ट की टीम। फोटो जागरण
HighLights
पूसा कृषि विश्वविद्यालय आदिवासी महिलाओं को दे रहा औषधीय खेती का प्रशिक्षण।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और पोषण सुधारने का है लक्ष्य।
शतावरी, अश्वगंधा जैसे पौधों की व्यावसायिक खेती पर जोर।
संवाद सूत्र, सिमुलतला (जमुई)। जिले में औषधीय संपदा के संरक्षण और जनजातीय महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (समस्तीपुर) ने अनूठी पहल शुरू की है।
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम चकाई प्रखंड के सतपोखरा और झाझा प्रखंड के आसपास के आदिवासी बहुल गांवों की 50 से अधिक महिलाओं को औषधीय पौधों के संरक्षण, उत्पादन तकनीक और वैज्ञानिक खेती का प्रशिक्षण दे रही है।
परियोजना प्रमुख व एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दिनेश राय ने बताया कि जमुई के जंगल प्राकृतिक रूप से औषधीय पौधों के समृद्ध भंडार रहे हैं, लेकिन लगातार अंधाधुंध दोहन के कारण इनके अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है।
बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए वैज्ञानिक अब इन पौधों की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने के लिए मिशन मोड में काम कर रहे हैं।
औषधीय फसलों की विशेषता है कि इनकी खेती कम उपजाऊ भूमि में भी की जा सकती है और पारंपरिक फसलों की तुलना में कई गुना अधिक मुनाफा मिल सकता है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य किसानों को सीधे बाजार से जोड़कर उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना भी है।
आजीविका के साथ पोषण सुधारने पर जोर
यह पहल केवल आजीविका तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से आदिवासी परिवारों की सेहत सुधारने की भी तैयारी है। शतावरी, अश्वगंधा, तुलसी, बेल और आंवला जैसे औषधीय पौधों को स्थानीय खान-पान और दिनचर्या में सम्मिलित कराने पर जोर दिया जा रहा है।
इससे महिलाओं और बच्चों के पोषण स्तर में सुधार तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य है। इस अभियान में वैज्ञानिक डॉ. शंकर झा और डा. शिव शंकर प्रसाद भी सक्रिय योगदान दे रहे हैं।
नवंबर-दिसंबर में फिर गांवों का दौरा करेंगे वैज्ञानिक
परियोजना की सतत निगरानी के लिए वैज्ञानिकों की टीम नवंबर-दिसंबर में फिर इन गांवों का दौरा करेगी। इस दौरान महिलाओं को नर्सरी प्रबंधन, जैविक खाद के प्रयोग, सिंचाई और कीट नियंत्रण के बारे में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
साथ ही सूख चुके पौधों की जगह नए पौधे लगाए जाएंगे। साथ ही भविष्य में एलोवेरा, कालमेघ, करंज और अशोक जैसे पौधों को भी परियोजना में सम्मिलित किया जाएगा।
इसके अलावा महिलाओं को औषधीय पौधों से तैयार उत्पादों की प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि स्थानीय स्तर पर ही उत्पादों का प्रसंस्करण कर उनकी आय बढ़ाई जा सके।
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