राशन दुकानदार की Gen-Z बेटी का कमाल, अभावों को मात देकर बनी बैंक कैशियर; बनीं परिवार की 'लक्ष्मी'
Laxmi Meri Lado Purnima Barnwal: जमुई के झाझा की पूर्णिमा बरनवाल, एक छोटे राशन दुकानदार की बेटी, ने अपनी कड़ी ...और पढ़ें
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बैंक में कार्य करती पूर्णिमा। (सौजन्य- स्वजन)
HighLights
छोटे राशन दुकानदार की बेटी पूर्णिमा बरनवाल बनीं बैंक कैशियर।
पश्चिम बंगाल ग्रामीण बैंक में मिली सफलता, परिवार का नाम रोशन।
बेटियों की शिक्षा और सशक्तिकरण का दिया सशक्त संदेश।
संवाद सूत्र, बोड़वा (जमुई)। Laxmi Meri Lado Purnima Barnwal: दीपावली की आहट के साथ घर-घर साफ-सफाई और दीप प्रज्वलन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।
मान्यता है कि प्रकाश पर्व पर मां लक्ष्मी का आगमन होता है, परंतु घर-परिवार की सच्ची लक्ष्मी तो वे बेटियां हैं, जिनके परिश्रम और संस्कारों से आंगन सदा प्रकाशित रहता है।
अपनी मेहनत और लगन से मिसाल बनीं झाझा नगर क्षेत्र के बाबूबांक निवासी पूर्णिमा बरनवाल ने इस बात को चरितार्थ कर दिखाया है।
साधारण परिवार और सीमित संसाधनों के बीच पली-बढ़ीं जेन-जी पीढ़ी की इस बेटी ने यह साबित कर दिया है कि यदि इरादे मजबूत हों तो कोई भी रुकावट राह नहीं रोक सकती।
पश्चिम बंगाल में कैशियर
पूर्णिमा वर्तमान में पश्चिम बंगाल ग्रामीण बैंक में कैशियर के पद पर पदस्थापित होकर पूरी निष्ठा के साथ अपनी सेवाएं दे रही हैं। पूर्णिमा के पिता मनोज कुमार एक छोटी सी राशन दुकान चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं।

माता-पिता के साथ पूर्णिमा।
वहीं, उनकी माता ललिता देवी एक समर्पित गृहिणी हैं। सीमित आमदनी और रोजमर्रा के संघर्षों के बावजूद माता-पिता ने कभी बेटी की पढ़ाई में रुकावट नहीं आने दी।
समाज की सोच और आर्थिक तंगियों को दरकिनार करते हुए उन्होंने अपनी लाडो के सपनों पर अटूट विश्वास जताया और हर कदम पर ढाल बनकर खड़े रहे।
बेटी ने भी माता-पिता के इस विश्वास को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया और बैंकिंग क्षेत्र की प्रतियोगी परीक्षा में सफलता हासिल कर परिवार व क्षेत्र का नाम रोशन कर दिया।
पूर्णिमा की मां ने कहा कि बेटियां कभी बोझ नहीं होतीं, वे साक्षात लक्ष्मी का रूप हैं। हमारे पास बहुत साधन नहीं थे, लेकिन पूर्णिमा की पढ़ाई में हमने कोई कसर नहीं छोड़ी।
आज जब लोग कहते हैं कि राशन दुकानदार की बेटी बैंक में अफसर जैसी कुर्सी पर बैठती है तो आंखें खुशी से भर आती हैं।
बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं
पिता मनोज कुमार ने कहा कि मैंने हमेशा माना कि बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं होना चाहिए। एक छोटी सी दुकान चलाते हुए बेटियों को पढ़ाना आसान नहीं था, लेकिन बेटी ने अपनी मेहनत से हमारा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। हमारी लाडो ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है।
झाझा के समाजसेवी सुरेश यादव ने कहा कि एक साधारण राशन दुकानदार की बेटी का बैंकिंग सेवा में चयन होना पूरे समाज के लिए गौरव का विषय है।
पूर्णिमा की यह उपलब्धि उन सभी परिवारों के लिए एक सीख है जो बेटियों की शिक्षा में संकोच करते हैं। समाज को अपनी सोच बदलनी होगी, क्योंकि बेटियां आगे बढ़ेंगी, तभी देश सशक्त बनेगा।
वहीं, श्रीकृष्ण गोशाला के सचिव सोनू बरनवाल का कहना है कि बाबूबांक मोहल्ले की सबसे होनहार छात्राओं में पूर्णिमा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
वे न केवल शिक्षा के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं, बल्कि मोहल्ले के बच्चों को शिक्षित करने के प्रति भी हमेशा समर्पित और लगनशील रही हैं। उनकी उपलब्धियों और योगदान से पूरे नगर का मान-सम्मान बढ़ा है।
एक छोटे से राशन दुकानदार की बेटी होने के नाते मैंने बचपन से माता-पिता को कड़ा संघर्ष करते देखा है। सीमित संसाधनों के बीच पढ़ाई पूरी कर इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था। जब भी मन विचलित होता, माता-पिता की मेहनत मेरी प्रेरणा बन जाती थी। आज बैंक में कैशियर के रूप में काम करते हुए मुझे गर्व होता है कि मैं अपने परिवार का सहारा बन सकी हूं। बेटियां अगर ठान लें, तो कोई भी लक्ष्य दूर नहीं है।
पूर्णिमा बरनवाल, कैशियर, पश्चिम बंगाल ग्रामीण बैंक