बिहार के जमुई में बनेगा देश का नौवां ‘गिद्ध रेस्टोरेंट’, नागी-नकटी जंगल में गिद्धों को मिलेगा सुरक्षित भोजन
बिहार के जमुई जिले में पर्यावरण संतुलन हेतु देश का नौवां 'गिद्ध रेस्टोरेंट' स्थापित किया जाएगा। यह पहल गिद्धों को ...और पढ़ें

कठबजरा जंगल में पेड़ पर बैठा गिद्धों का जोड़ा। सौजन्य : वन विभाग।
HighLights
जमुई में देश का नौवां गिद्ध रेस्टोरेंट स्थापित होगा।
गिद्धों को डाइक्लोफिनेक-मुक्त सुरक्षित भोजन मिलेगा।
हिमालयन ग्रीफन गिद्धों के संरक्षण पर जोर दिया जाएगा।
संवाद सहयोगी, जमुई। पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका निभाने वाले 'प्रकृति के सफाई कर्मियों' यानी गिद्धों के संरक्षण और संवर्धन के लिए बिहार के जमुई जिले में एक बड़ी पहल की शुरुआत होने जा रही है।
झाझा प्रखंड के नागी और नकटी जलाशय के बीच स्थित घने कठबजरा जंगल में देश के नौवें 'गिद्ध रेस्टोरेंट' की स्थापना की जाएगी। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को हरी झंडी दे दी है, जिसके बाद स्थानीय स्तर पर इसकी प्रशासनिक कवायद शुरू हो गई है।
प्रभारी जिला वन पदाधिकारी मनीष कुमार वर्मा ने बताया कि पिछले साल ठंड और गर्मी के संधिकाल के दौरान नागी-नकटी जलाशय के आसपास हिमालयन ग्रीफन (हिमालयन गिद्ध) का बड़ा झुंड देखा गया था।
मूल रूप से नेपाल, भूटान और तिब्बत जैसे ठंडे प्रदेशों में पाए जाने वाले इन पक्षियों के आगमन और उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस विशेष केंद्र की स्थापना का निर्णय लिया गया है।
देश के अन्य हिस्सों में कहाँ-कहाँ संचालित हैं गिद्ध रेस्टोरेंट
वर्तमान समय में देश के चुनिंदा राज्यों में ही इस प्रकार के विशेष संरक्षण केंद्र संचालित हैं। इनमें महाराष्ट्र का फणसाड वन्यजीव अभयारण्य, गढ़चिरोली वन प्रमंडल और नासिक का हरसुल, झारखंड का गुमो, छत्तीसगढ़ का बस्तर, हिमाचल प्रदेश का सुखनारा, गुजरात की पावागढ़ पहाड़ी तथा पश्चिम चंपारण का नवलपरासी क्षेत्र शामिल हैं। अब इस सूची में जमुई का नाम भी जुड़ने जा रहा है।
तीन स्तर पर होगी जाँच, केमिकलमुक्त मांस मिलेगा
गिद्धों के लिए स्थापित होने वाले इस विशेष रेस्टोरेंट में स्थानीय किसानों और पशुपालकों से समन्वय स्थापित कर मृत गाय, भैंस और अन्य मवेशियों के शवों को एकत्रित किया जाएगा। इससे किसानों को भी अपने मृत मवेशियों को ठिकाने लगाने में बड़ी सहूलियत मिलेगी।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गिद्धों को मृत मवेशियों का मांस परोसने से पूर्व पशु चिकित्सकों की देखरेख में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि पशु के शरीर में दर्द निवारक दवा 'डाईक्लोफिनेक' (Diclofenac) या अन्य कोई हानिकारक केमिकल मौजूद न हो।
तीन स्तरों पर कठोर परीक्षण के बाद ही शवों को भोजन के रूप में रखा जाएगा, ताकि इनकी संख्या तेजी से बढ़ सके। इसके अलावा, इनकी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए इस वर्ष वन विभाग द्वारा इनके पंखों पर विशेष टैग (Tagging) भी लगाए जाएंगे।
विशेषज्ञों की राय और चिंताएं
पक्षी विशेषज्ञ अरविंद कुमार मिश्रा के अनुसार, गिद्ध मृत पशुओं का मांस खाकर पर्यावरण को दूषित होने से बचाते हैं। पूर्व में मवेशियों के इलाज में उपयोग होने वाली दर्द निवारक दवाओं (जैसे डाईक्लोफिनेक) के अवशेष वाला मांस खाने से लंबी चोंच वाले, सफेद पृष्ठभूमि वाले, भारतीय और स्लेंडर बिल्ड गिद्धों की किडनी फेल होने से सबसे अधिक मौतें हुई हैं।
यही वजह है कि सरकार ने ऐसी दवाओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया है। चूँकि गिद्ध वर्ष में केवल एक ही अंडा देते हैं, इसलिए इनकी प्राकृतिक वृद्धि की रफ्तार बेहद धीमी होती है, जिसके लिए ऐसे संरक्षण केंद्रों की सख्त जरूरत है।
