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छठ पर जहानाबाद में बढ़ रही बांस के खचिया की मांग, आरा से आकर पुश्तैनी परंपरा निभा रहे शंकर

Published: Thu, 05 Nov 2026 03:26 PM (IST)

छठ महापर्व नजदीक आते ही जहानाबाद के बाजारों में बांस के खचिया (दउरा) की मांग बढ़ गई है। आरा से ...और पढ़ें

आरा से आकर पुश्तैनी परंपरा निभा रहे शंकर

आरा से आकर पुश्तैनी परंपरा निभा रहे शंकर

HighLights

  1. छठ महापर्व के लिए जहानाबाद में खचिया की मांग बढ़ी।

  2. आरा के शंकर दयाल पुश्तैनी हुनर से खचिया बना रहे।

  3. पारंपरिक बांस के खचिया 100 से 220 रुपये में बिक रहे।

मनोज कुमार नारायण, रतनी फरीदपुर (जहानाबाद)। छठ महापर्व नजदीक आते ही बाजारों में पर्व की तैयारियां तेज हो गई हैं। साथ ही बांस से बने खचिया (दउरा) की मांग भी बढ़ने लगी है। हर साल दशहरा के बाद आरा जिले के अगरसंडा गांव निवासी शंकर दयाल शकुराबाद पहुंचते हैं और छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाले बांस के खचिया बनाने में जुट जाते हैं। 

करीब तीन खचिया प्रतिदिन तैयार करने वाले शंकर इस बार भी अपने पुश्तैनी हुनर को जीवित रखने में लगे हैं। उनके बनाए खचिया 100, 150 और 220 रुपये की कीमत पर बिक रहे हैं। छठ पर्व के बाद बिक्री पूरी कर वह अपने गांव लौट जाते हैं। 

दादा के समय से चली आ रही परंपरा

शंकर दयाल बताते हैं कि शकुराबाद में खचिया बनाने की परंपरा उनके दादा के समय से चली आ रही है। दादा के बाद पिता, चाचा और भाई भी इस काम में लगे रहे। करीब 15 वर्ष पहले तक परिवार के एक दर्जन से अधिक सदस्य यहां आकर दो-तीन महीने तक खचिया बनाते और बेचते थे। 

सभी की आजीविका इसी पारंपरिक कारोबार से चलती थी। वे हर साल शकुराबाद थाना के समीप सेसंबा निवासी हरिशंकर पांडेय के मकान में ठहरते हैं। 

लेकिन समय के साथ नई पीढ़ी ने इस पुश्तैनी काम से दूरी बना ली। अब परिवार के अन्य सदस्यों के नहीं रहने और युवाओं के दूसरे रोजगार से जुड़ जाने के कारण शंकर अकेले ही यह काम कर रहे हैं।

मजबूती के कारण आज भी बनी है मांग

बांस से बने खचिया की मजबूती और उपयोगिता के कारण छठ महापर्व में इसकी विशेष मांग रहती है। व्रती और श्रद्धालु इसी में फल, नारियल और अन्य पूजन सामग्री सजाकर भगवान भास्कर को अर्घ्य देने घाट तक ले जाते हैं। शंकर के लिए यह काम केवल रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि परिवार की विरासत को बचाए रखने का प्रयास भी है। 

बदलते दौर में जहां पारंपरिक हस्तकला से कारीगरों का जुड़ाव कम हो रहा है, वहीं उनका अकेले इस हुनर को संभालना परंपरा के प्रति समर्पण की मिसाल है।

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