सनातन की राह पर रूस, 5 विदेशी महिलाओं ने गयाजी में किया पिंडदान; बोलीं- असीम शांति मिली
रूस से आईं पांच महिलाओं ने मोक्षभूमि गयाजी में वैदिक विधि-विधान से अपने पितरों का पिंडदान और तर्पण किया। इस ...और पढ़ें

सनातन की राह पर रूस, 5 विदेशी महिलाओं ने गयाजी में किया पिंडदान; बोलीं- असीम शांति मिली
HighLights
रूस से आईं पांच महिलाओं ने गयाजी में पिंडदान किया।
वैदिक विधि-विधान से पितरों की मोक्ष कामना हेतु कर्मकांड संपन्न।
सनातन धर्म की वैश्विक पहुंच और 'वसुधैव कुटुंबकम्' का संदेश।
जागरण संवाददाता, गयाजी। मोक्षभूमि गयाजी में गुरुवार को फल्गु नदी का तट एक ऐसी आस्था का साक्षी बना, जहां देश की सीमाएं और भाषा की दीवारें छोटी पड़ गईं। अपने पितरों की मोक्ष की कामना लेकर रूस से आईं पांच महिलाओं ने वैदिक विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण किया।
भारतीय परिधान में सजी विदेशी महिलाओं ने वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पूरे श्रद्धाभाव से कर्मकांड संपन्न किया। पिंडदान के बाद उनके चेहरों पर आत्मिक शांति और संतोष का भाव साफ दिखाई दे रहा था।

रूस से आए पांच सदस्यीय दल में नीना हारा, अनास्तासिया इस्मागिलोवा, यूलिया लावरेन्तिएवा, केसेनिया अब्रामोवा और ल्यूडमिला शालामोवा शामिल थीं। इनके साथ युत्खेश्वरी राधा दासी भी थीं। सभी ने फल्गु तट के साथ विष्णुपद और अक्षयवट वेदी पर एक दिवसीय पिंडदान का विधान पूरा किया।
नीना हारा ने कहा कि वह अपने पितरों की मोक्ष की कामना लेकर गयाजी आई हैं। यहां पिंडदान और तर्पण करने से उन्हें असीम शांति की अनुभूति हो रही है। उन्हें ऐसा लग रहा है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए उन्हें गयाजी ही लेकर आई है।

मॉस्को निवासी अनास्तासिया इस्मागिलोवा ने बताया कि उन्हें सनातन धर्म में पिंडदान और तर्पण के महत्व के बारे में जानकारी मिली। इस्कॉन से प्रेरित होकर वह रूस से गयाजी पहुंची हैं।
उन्होंने कहा कि सनातन के जीवन दर्शन से प्रभावित होकर वह कई देशों में इसके बारे में लोगों को जानकारी दे रही हैं। गयाजी आकर पिंडदान करना उनके लिए आध्यात्मिक अनुभव है।

इस्कॉन मंदिर के अध्यक्ष जगदीश श्याम दास ने बताया कि विदेशी महिलाओं ने पूरी श्रद्धा के साथ फल्गु, विष्णुपद और अक्षयवट वेदी पर कर्मकांड किया। सभी महिलाएं भारतीय परिधान में थीं और वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच विधि-विधान पूरा किया।
गयाजी को मोक्षभूमि के रूप में विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। यहां पितरों की मोक्ष कामना से देश-विदेश से लोग आते हैं।
रूस से आईं इन महिलाओं की आस्था ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि सनातन की आध्यात्मिक परंपरा सीमाओं से परे है। मोक्ष की कामना में अपना-पराया नहीं होता और यही भारतीय संस्कृति की वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को साकार करता है।
