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Pitru Paksha: 676 सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई, सत्तू से पिंड बनाकर उड़ाने की परंपरा; गया के प्रेतशिला में कैसे होता है तर्पण?

Published: Sun, 27 Sep 2026 01:21 PM (IST)

गया के प्रेतशिला (Pretshila Pind Daan) में पितृपक्ष मेले के दूसरे दिन हजारों श्रद्धालुओं ने 676 सीढ़ियां चढ़कर पूर्वजों का ...और पढ़ें

प्रेतशिला में पिंडदान। फोटो जागरण

प्रेतशिला में पिंडदान। फोटो जागरण

HighLights

  1. प्रेतशिला में 676 सीढ़ियां चढ़कर पितरों का पिंडदान।

  2. सत्तू से पिंड बनाने और उड़ाने की विशेष परंपरा।

  3. बुजुर्गों के लिए डोली-खटोली की सुविधा उपलब्ध।

सुभाष कुमार, गयाजी। प्रेतशिला की 676 सीढ़ियां... कहीं हाथ में पिंडदान की सामग्री, कहीं पूर्वजों के नाम का संकल्प और कहीं बुजुर्ग परिजन को सहारा देते कदम। चढ़ाई कठिन थी, लेकिन पितरों की मुक्ति की आस ने थकान को पीछे छोड़ दिया।

पितृपक्ष मेला (Pitru Paksha Mela 2026) के दूसरे दिन रविवार को प्रेतशिला में ऐसा ही आस्था का दृश्य देखने को मिला। सुबह से ही हजारों पिंडदानी ब्रह्मसरोवर की ओर बढ़ते रहे।

स्नान और तर्पण के बाद श्रद्धालुओं ने प्रेतशिला की सीढ़ियां चढ़ीं और वेदी पर पहुंचकर अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान किया। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए श्रद्धालुओं के मंत्रोच्चार से पूरा प्रेतशिला क्षेत्र पितृ स्मरण के भाव से सराबोर रहा।

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धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्रेतशिला वेदी अकाल मृत्यु को प्राप्त स्वजनों के निमित्त पिंडदान के लिए विशेष महत्व रखती है। इसी मान्यता के कारण पितृपक्ष में यहां देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

प्रेतशिला की पिंडदान परंपरा में सत्तू से पिंड बनाने और बाद में सत्तू उड़ाने की भी विशेष परंपरा है। आस्था के अनुसार इसे पितरों की मुक्ति की कामना से जोड़ा जाता है।

धनबाद से छत्तीसगढ़ तक, पितरों की शांति को पहुंचे श्रद्धालु

झारखंड के धनबाद बैंक मोड़ निवासी सुरेंद्र गोयल छह लोगों के साथ प्रेतशिला पहुंचे। उन्होंने बताया कि परिवार के सदस्य 17 दिनी पिंडदान कर रहे हैं।

मुख्य यजमान पुरुषोत्तम गोयल और विनोद गोयल समेत परिवार के अन्य सदस्य श्राद्ध कर्म में शामिल हैं। छत्तीसगढ़ के खरसिया निवासी आशीष अग्रवाल तीन परिवार के सदस्यों के साथ यहां पहुंचे।

उन्होंने बताया कि वे 17 दिन का पिंडदान कर रहे हैं और इसकी शुरुआत पुनपुन नदी से की है। उनका व्यवसाय भवन निर्माण सामग्री, छड़ और सीमेंट से जुड़ा है। कोलकाता, दिल्ली, जयपुर समेत कई राज्यों से आए श्रद्धालुओं ने भी प्रेतशिला वेदी पर पिंडदान किया।

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ओडिशा के राउरकेला क्षेत्र के गढ़पोस से आए 13 परिवार के दलमिया परिवार के मुख यजमान बांके बिहारी निया ने भी पूर्वजों का पिंडदान किया। आचार्य अरुण मिश्रा और अरुण कुमार पाठक ने कई श्रद्धालुओं को पिंडदान कराया।

सत्तू के पिंड से पितरों को अर्पण, उड़ाने की भी परंपरा

प्रेतशिला में होने वाले पिंडदान की अपनी अलग परंपरा है। यहां श्रद्धालु सत्तू से पिंड तैयार कर पितरों को अर्पित करते हैं। पिंडदान के बाद सत्तू उड़ाने की परंपरा भी निभाई जाती है।

धार्मिक आस्था में इसे पितरों की मुक्ति और प्रेतबाधा से मुक्ति की कामना से जोड़ा जाता है। गयाजी गजाधर धामी पांडा समिति के सदस्य शिवा कुमार पांडे ने बताया कि प्रेतशिला की धार्मिक मान्यता प्राचीन ग्रंथों से जुड़ी है।

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वायु पुराण में यहां भगवान ब्रह्मा द्वारा यज्ञ किए जाने का उल्लेख है। ब्रह्मसरोवर और प्रेतशिला से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का भी विशेष महत्व है।

300 डोली-खटोली, बुजुर्गों को पहाड़ी चढ़ा रहे मांझी परिवार

676 सीढ़ियों की चढ़ाई बुजुर्ग और शारीरिक रूप से असमर्थ पिंडदानियों के लिए कठिन होती है। ऐसे श्रद्धालुओं के लिए डोली-खटोली बड़ा सहारा बनी है।

प्रेतशिला के आसपास के गांवों के मांझी परिवार के करीब 300 लोग इस सेवा में लगे हैं। ढकाईन, भागलपुर, चना, शेरपुर, चिरैयाटांड़ और नियाजीपुर समेत आसपास के गांवों से लोग डोली-खटोली लेकर पहुंचे हैं।

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दो लोग मिलकर श्रद्धालुओं को डोली में बैठाकर पहाड़ी पर स्थित वेदी तक पहुंचाते हैं। इसके लिए दूरी और सेवा के अनुसार करीब 600 से 1200 रुपये तक शुल्क लिया जा रहा है।

बैरिकेडिंग से आवागमन सुगम, जाम से मिली राहत

पितृपक्ष के दूसरे दिन प्रेतशिला जाने वाले मार्ग पर जिला प्रशासन की ओर से यातायात व्यवस्था नियंत्रित रखी गई। सड़क मार्ग पर बैरिकेडिंग की गई है।

बड़े वाहनों और चारपहिया वाहनों को निर्धारित स्थान पर रोककर श्रद्धालुओं को आटो और ई-रिक्शा के माध्यम से प्रेतशिला की ओर भेजा जा रहा है।

पिंडदानियों ने प्रशासन की व्यवस्था की सराहना की। श्रद्धालुओं के अनुसार प्रेतशिला जाने के क्रम में इस बार जाम की समस्या कम रही।

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मेला क्षेत्र में वरीय अधिकारियों की लगातार निगरानी और पुलिस बल की तैनाती से आवागमन सुगम रहा। प्रेतशिला वेदी पर पिंडदान करने में भी श्रद्धालुओं को सुविधा मिली।

रोपवे का इंतजार, अभी सीढ़ियां और डोली ही सहारा

प्रेतशिला पहाड़ी पर रोपवे का निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है। इस कारण पितृपक्ष मेला-2026 में श्रद्धालुओं को रोपवे की सुविधा नहीं मिल सकेगी।

फिलहाल बुजुर्ग और असमर्थ पिंडदानी डोली-खटोली के सहारे वेदी तक पहुंच रहे हैं। रोपवे शुरू होने के बाद पहाड़ी तक पहुंचने में श्रद्धालुओं को राहत मिलने की उम्मीद है।

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