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Pitru Paksha Gaya Ji: सातीकुंड में बालू से क्यों होता है पिंडदान? 9वें दिन उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

Published: Sun, 04 Oct 2026 05:07 PM (IST)

Pitru Paksha 2026 के नौवें दिन सीताकुंड पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने बालू के पिंड से पिंडदान किया।

पिंडदान करते श्रद्धालु। फोटो जागरण

पिंडदान करते श्रद्धालु। फोटो जागरण

HighLights

  1. पितृपक्ष के नौवें दिन सीताकुंड पर बालू के पिंड से पिंडदान।

  2. माता सीता ने फल्गु रेत से राजा दशरथ का पिंडदान किया था।

  3. फल्गु नदी के स्पर्श से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जागरण संवाददाता, गयाजी। सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। एक पखवारे तक चलने वाले पितृपक्ष में देश-विदेश से बड़ी संख्या में पिंडदानी अपने पितरों के मोक्ष की कामना लेकर गयाजी पहुंचते हैं। 

अब पितृपक्ष अंतिम चरण में पहुंच गया है। पितृपक्ष के नौवें दिन रविवार को सीताकुंड और रामगया पिंडवेदी पर बड़ी संख्या में पिंडदानियों ने अपने पितरों की मुक्ति के लिए कर्मकांड किया।

सीताकुंड में फल्गु नदी की पवित्र रेत से पिंड बनाकर पितरों को अर्पित किए गए। गयापाल पुरोहितों ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ पिंडदान की विधि संपन्न कराई।

मंत्रों की गूंज से पूरा सीताकुंड वेदी क्षेत्र आध्यात्मिक वातावरण में डूबा रहा। कर्मकांड की शुरुआत पिंडदानियों ने फल्गु नदी के पवित्र जल से तर्पण कर की।

इसके बाद विधि-विधान से बालू के पिंड तैयार किए गए और नामित पितरों को अर्पित किया गया। पिंडदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पिंड को फल्गु नदी में प्रवाहित किया गया। इस दौरान पिंडदानी अपने पितरों के मोक्ष और परिवार की सुख-शांति की कामना करते नजर आए। 

माता सीता ने ससुर दशरथ का किया था पिंडदान

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम अपने पिता राजा दशरथ के मोक्ष की कामना को लेकर गयाजी आए थे।

पिंडदान की सामग्री खरीदने के लिए भगवान श्रीराम बाजार गए थे। इसी दौरान राजा दशरथ प्रकट हुए और पिंडदान करने को कहा। उस समय पिंडदान की सामग्री उपलब्ध नहीं होने पर माता सीता ने फल्गु नदी की रेत से ही पिंड बनाकर राजा दशरथ का पिंडदान किया था।

इसी मान्यता के कारण सीताकुंड में आज भी बालू के पिंड से पिंडदान करने की परंपरा चली आ रही है। पिंडदानी फल्गु की रेत से पिंड बनाकर अपने नामित पितरों को अर्पित करते हैं।

धार्मिक मान्यता है कि फल्गु नदी के स्पर्श मात्र से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से पैर के अंगूठे के फल्गु के जल से स्पर्श को भी पितरों की मुक्ति से जोड़कर देखा जाता है।

पितृपक्ष के दसवें दिन सोमवार को गया सिर और गया कूप वेदी पर पिंडदान और कर्मकांड किया जाएगा। 10 अक्टूबर को पितृपक्ष का समापन होगा।  

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