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पूर्वजों के मोक्ष की कामना... गया जी पहुंचे जर्मन-रशियन समेत कई विदेशी श्रद्धालु, फल्गु नदी तट पर किया पिंडदान  

Published: Sun, 04 Oct 2026 09:20 AM (IST)

गया में Pitru Paksha के दौरान जर्मनी, रूस, यूक्रेन समेत कई देशों से विदेशी पिंडदानी अपने पूर्वजों के मोक्ष की कामना लेकर पिंडदान करने पहुंचे हैं।

पिंडदान करते विदेशी श्रद्धालु। फोटो जागरण

पिंडदान करते विदेशी श्रद्धालु। फोटो जागरण

HighLights

  1. विदेशी पिंडदानियों ने गयाजी में पूर्वजों का तर्पण किया।

  2. जर्मनी, रूस, यूक्रेन से आए श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पिंडदान किया।

  3. फल्गु तट से अक्षयवट तक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए।

संजय कुमार, गयाजी। यहां शांति है... सुकून है... पारिवारिक रिश्तों में मजबूती, सामाजिक जीवन में अपनापन और सहयोग की भावना है। सनातन संस्कृति के इसी अद्भुत संस्कार से विदेशी मेहमान भी अभिभूत हैं।

अपने पूर्वजों के तर्पण और मोक्ष की कामना लेकर गयाजी पहुंचे इन विदेशी पिंडदानियों ने फल्गु तट पर पूरे विधि-विधान से पिंडदान का संकल्प लिया है।

सनातन परंपरा की गहरी जड़ों और उसके वैश्विक प्रभाव की झलक इन दिनों गयाजी में दिखाई दे रही है। पितृपक्ष में देश के कोने-कोने से श्रद्धालु पूर्वजों के निमित्त पिंडदान और तर्पण के लिए पहुंच रहे हैं।

इसी आस्था से जुड़कर विदेशों से भी पिंडदानी गयाजी आ रहे हैं। पिछले आठ-नौ वर्षों में विदेशी पिंडदानियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

इस वर्ष जर्मनी, रूस, यूक्रेन, इटली समेत विभिन्न देशों से 22 विदेशी पिंडदानी यहां पहुंचे हैं। इनमें महिलाओं की संख्या अधिक है।

फल्गु से अक्षयवट तक आस्था का सफर

शुक्रवार को विदेशी पिंडदानियों ने विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी तट पर पिंडदान किया। शनिवार को प्रेतशिला, रामशिला, कागबलि और सीताकुंड वेदियों पर कर्मकांड किया।

रविवार को अक्षयवट वेदी पर पिंडदान के साथ उनका गयाजी का धार्मिक अनुष्ठान पूरा होगा। इसके बाद सभी वाराणसी लौट जाएंगे।

प्रेतशिला वेदी से जुड़ी मान्यता है कि अकाल मृत्यु होने पर यहां कर्मकांड करने से मृत आत्मा को मुक्ति मिलती है।

वहीं, सीताकुंड के बारे में मान्यता है कि माता सीता ने यहां अपने श्वसुर राजा दशरथ का पिंडदान किया था। इन मान्यताओं और परंपराओं को विदेशी पिंडदानी करीब से समझ रहे हैं और पूरे श्रद्धाभाव से कर्मकांड में शामिल हो रहे हैं।

ऐसा अनुभव भारत में ही देखने को मिलता है

जर्मनी की स्वेतलाना ने बताया कि वह अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना लेकर गयाजी आई हैं। यहां पिंडदान करने के बाद उन्हें बेहद अच्छा लग रहा है।

रूस की ब्रिनेवा ने कहा कि गयाजी आकर उन्हें बहुत सुकून मिल रहा है। कई पीढ़ियों से अपने पूर्वजों के प्रति लोगों की श्रद्धा और उनके मोक्ष की कामना का भाव अद्भुत है। ऐसा अनुभव भारत में ही देखने को मिलता है।

यूक्रेन के सोमेवको ने कहा कि वह अपने देश लौटकर गयाजी में किए गए अनुष्ठान और यहां की परंपराओं के बारे में लोगों को बताएंगे, ताकि दूसरे लोग भी इस संस्कृति को समझने के लिए यहां आ सकें।

इंटरनेट से मिली जानकारी, आचार्य ने दिखाई राह

विदेशी पिंडदानियों ने इंटरनेट और गूगल के माध्यम से गयाजी और यहां होने वाले पिंडदान के बारे में जानकारी जुटाई थी।

वाराणसी भ्रमण के दौरान उन्हें पितृपक्ष मेला और गयाजी में पिंडदान की धार्मिक परंपरा के बारे में आचार्य लोकनाथ गौड़ से जानकारी मिली।

आचार्य ने उन्हें पितृ कल्याण और पिंडदान से जुड़ी मान्यताओं के बारे में विस्तार से बताया। इसके बाद सभी ने गयाजी आकर पिंडदान करने का निर्णय लिया।

आचार्य लोकनाथ गौड़ ने बताया कि अक्षयवट वेदी पर कर्मकांड पूरा करने के बाद सभी विदेशी पिंडदानी वाराणसी लौट जाएंगे।

विदेशी श्रद्धालुओं का यह आध्यात्मिक अनुभव गयाजी की उस परंपरा को भी रेखांकित करता है, जिसमें देश की सीमाओं से परे जाकर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का भाव जुड़ता दिखाई देता है।

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