पितृपक्ष में रेत बनी रोजगार का सहारा, गया की सीताकुंड वेदी पर भारी डिमांड; हर रोज हजारों की कमाई
गया के सीताकुंड वेदी पर पितृपक्ष के दौरान फल्गु नदी की रेत की मांग बढ़ने से स्थानीय लोगों को रोजगार ...और पढ़ें

रेत से पिंडदान करते श्रद्धालु। फोटो जागरण
HighLights
सीताकुंड वेदी पर फल्गु नदी की रेत की मांग बढ़ी।
रेत बेचकर स्थानीय महिला-पुरुष प्रतिदिन अच्छी कमाई कर रहे।
पितृपक्ष के दौरान यह रेत रोजगार का बड़ा साधन।
संजय कुमार, गयाजी। Pitru Paksha सिर्फ धार्मिक आस्था और पितरों के मोक्ष का पर्व नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का भी बड़ा अवसर लेकर आता है।
गयाजी के प्रसिद्ध सीताकुंड वेदी पर इन दिनों फल्गु नदी की रेत की मांग बढ़ गई है। पिंडदान की विशेष परंपरा से जुड़ी इस रेत को बेचकर आसपास के महिला-पुरुष पितृपक्ष के दौरान अच्छी कमाई कर रहे हैं।पिंडदानियों की बढ़ती भीड़ के बीच सीताकुंड परिसर में रेत बेचने वालों की संख्या भी बढ़ गई है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम की अनुपस्थिति में माता सीता ने फल्गु नदी की रेत से अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान किया था। इस पिंडदान से राजा दशरथ को मोक्ष की प्राप्ति हुई।
इसी धार्मिक प्रसंग के कारण सीताकुंड वेदी पर बालू यानी रेत से पिंड बनाने और पिंडदान करने की परंपरा चली आ रही है। देश-विदेश से आने वाले पिंडदानी भी इस विधान को पूरा करने के लिए फल्गु नदी की पवित्र रेत को विशेष महत्व देते हैं।
पितृपक्ष का पखवाड़ा बनता है कमाई का बड़ा सहारा
सीताकुंड पर रेत की मांग पितृपक्ष के दौरान काफी बढ़ जाती है। आसपास रहने वाले महिला और पुरुष फल्गु नदी से रेत निकालकर पिंडदानियों तक पहुंचाते हैं।
रेत की बिक्री से उन्हें प्रतिदिन एक हजार से 12 सौ रुपये तक की आमदनी हो रही है। रेत बेचने वाले काजल कुमारी, अजय मालाकार और शोभा देवी बताते हैं कि पितृपक्ष का पखवाड़ा उनके लिए रोजगार का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। पूरे साल में इसी अवधि से उन्हें अच्छी कमाई की उम्मीद रहती है।
आस्था के साथ जुड़ा स्थानीय रोजगार
रेत विक्रेताओं का कहना है कि सामान्य दिनों में रेत की बिक्री सीमित रहती है, लेकिन पितृपक्ष शुरू होते ही इसकी मांग अचानक बढ़ जाती है।
बड़ी संख्या में पिंडदानी सीताकुंड पहुंचते हैं और विधि-विधान से पिंडदान करते हैं। ऐसे में रेत की आपूर्ति करने वाले परिवारों के लिए यह मेला अतिरिक्त रोजगार का अवसर बन जाता है। कई परिवार पितृपक्ष शुरू होने से पहले ही रेत की व्यवस्था में जुट जाते हैं।
रेत का पिंड अर्पित कर पितरों के मोक्ष की कामना
आचार्य लाल भूषण मिश्र याज्ञिक ने बताया कि सीताकुंड में रेत से पिंडदान की परंपरा माता सीता से जुड़ी हुई है। फल्गु नदी की रेत से पिंड बनाकर पितरों को अर्पित करना यहां के प्रमुख धार्मिक विधान में शामिल है।
पिंडदानी पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से इस परंपरा का पालन करते हैं। वहीं पितृपक्ष के दौरान सीताकुंड में देश-विदेश से पिंडदानी पहुंच रहे हैं। वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच रेत के पिंड अर्पित किए जाने से पूरा परिसर धार्मिक वातावरण में डूबा रहता है।
