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सिर पर ईंट ढोकर बेटी को पढ़ाया, पूर्वी चंपारण की सरिता 19 वर्ष में बनीं कांस्टेबल, अब IAS बनने का सपना

Published: Thu, 05 Nov 2026 06:56 AM (IST)

Bihar Police Constable Success Story: पूर्वी चंपारण की सरिता कुमारी ने 19 साल की उम्र में बिहार पुलिस कांस्टेबल बनकर ...और पढ़ें

जीवन में अभावों का रोना रोने वालों के लिए उनकी यह संघर्ष गाथा कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देती है।

जीवन में अभावों का रोना रोने वालों के लिए उनकी यह संघर्ष गाथा कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देती है।

HighLights

  1. 19 वर्ष की आयु में बिहार पुलिस कांस्टेबल बनीं सरिता।

  2. मजदूर पिता के सहयोग से ऑनलाइन पढ़ाई कर हासिल की सफलता।

  3. अब पुलिस की जिम्मेदारी निभाते हुए आईएएस बनने की तैयारी में।

आदित्य कुमार सिंह, पताही (पूर्वी चंपारण)। Sarita Kumari Bihar Police Constable: संसाधनों की कमी और विपरीत परिस्थितियों के बीच कैसे अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहा जाता है, यह कोई पूर्वी चंपारण की इस होनहार बेटी से सीख सकता है।

बेटी का सपना पूरा करने के लिए पिता ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और कड़ी मजदूरी की, ताकि पढ़ाई में कोई बाधा न आए। इसके जवाब में बेटी ने भी अपना सबकुछ झोंक दिया और पहले ही प्रयास में सफलता हासिल कर बिहार पुलिस में कांस्टेबल बन गईं।

सपना देखने और उसे पूरा करने के लिए संघर्ष करने का यह सिलसिला यहीं थमा नहीं है, क्योंकि सरिता बचे हुए समय में अब आईएएस की तैयारी में जुटी हैं। जीवन में अभावों का रोना रोने वालों के लिए उनकी यह संघर्ष गाथा कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देती है।

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संघर्ष भरी राह

जिस उम्र में युवा सामान्य रूप से मौज-मस्ती और खेलकूद में अपना समय बिताते हैं, उस उम्र में पताही प्रखंड के बोकाने कला गांव की रहने वाली सरिता कुमारी ने अपनी कड़ी मेहनत, अटूट लगन और दृढ़ संकल्प से एक बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है।

महज 19 वर्ष की उम्र में बिहार पुलिस में कांस्टेबल बनने वाली सरिता की यह पूरी कहानी संघर्ष, अनुशासन और बड़े सपने देखने के साहस की एक अनूठी मिसाल है। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सरिता ने अपने पहले ही प्रयास में यह सफलता हासिल कर अपने माता-पिता के तमाम सपनों को पूरा किया है।

वर्तमान जिम्मेदारी

वर्तमान में वह मुजफ्फरपुर जिले में बिहार पुलिस की एक निष्ठावान कांस्टेबल के रूप में अपनी सेवा दे रही हैं और पूरी जिम्मेदारी निभा रही हैं। सरकारी नौकरी मिलने के बाद भी उनके बड़े सपने कहीं थमे नहीं हैं, बल्कि वह जीवन में और आगे बढ़ने के लिए यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में पूरी शिद्दत से जुटी हुई हैं।

उनकी यह प्रेरक कहानी ग्रामीण क्षेत्रों के उन तमाम युवाओं और बेटियों के लिए एक बड़ी सीख है, जो सीमित संसाधनों का हवाला देकर बड़े सपने देखने से अक्सर हिचकिचाते हैं।

मजदूर पिता का साथ

सरिता के पिता ध्रुव चौधरी गांव में कड़ी मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। घर की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के बावजूद उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई और उसके सपनों को पंख देने में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी।

सीमित और तंग संसाधनों के बीच भी उन्होंने हमेशा सरिता को आगे बढ़ने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया। माता-पिता का यह सपना था कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर पुलिस में भर्ती हो और पूरे परिवार का नाम रोशन करे।

सपनों को सच किया

सरिता ने भी अपने माता-पिता के इस पवित्र सपने को अपना मुख्य लक्ष्य बना लिया और इसे पूरा करने के लिए दिन-रात कठिन परिश्रम किया। आखिरकार इस होनहार बेटी ने अपनी बेजोड़ मेहनत के दम पर बिहार पुलिस में कांस्टेबल बनकर माता-पिता के सभी सपनों को धरातल पर उतार दिया।

उनकी इस शानदार सफलता ने पूरे परिवार को गौरवान्वित कर दिया है और यह साबित कर दिखाया है कि आर्थिक कठिनाइयां कभी भी मजबूत इच्छाशक्ति के आगे बड़ी बाधा नहीं बन सकतीं।

सुबह तीन बजे दौड़

सरिता की इस बड़ी सफलता के पीछे उनके नियमित अभ्यास और कड़े अनुशासन की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वह सुबह तीन बजे भोर में ही घर से निकलकर करीब 12 किलोमीटर दूर पकड़ीदयाल के बड़कागांव हाईस्कूल के मैदान में दौड़ का अभ्यास करने जाती थीं।

अपनी शारीरिक फिटनेस और तैयारी के साथ-साथ उन्होंने अपनी अकादमिक पढ़ाई पर भी पूरा फोकस बनाए रखा। सुबह दौड़ लगाकर घर लौटने के बाद वह यूट्यूब और ऑनलाइन डिजिटल कक्षाओं का सहारा लेकर अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करती थीं।

ऑनलाइन शिक्षा का लाभ

सीमित संसाधनों के बीच भी सरिता ने उपलब्ध साधनों का बहुत ही बेहतर उपयोग किया और अपने तय लक्ष्य की ओर लगातार कदम बढ़ाती रहीं। उनकी अथक मेहनत और आत्मविश्वास का ही यह सुखद परिणाम रहा कि उन्हें बिहार पुलिस कांस्टेबल की भर्ती परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में बड़ी सफलता मिल गई।

महज 19 वर्ष की अल्प आयु में मिली इस ऐतिहासिक उपलब्धि से उनके पूरे घर और गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। सरिता ने अपनी सफलता से यह साबित कर दिया कि निरंतर प्रयास से हर कठिन लक्ष्य को आसानी से जीता जा सकता है।

यूपीएससी की तैयारी

बिहार पुलिस में कांस्टेबल की प्रतिष्ठित नौकरी मिलने के बाद भी सरिता ने अपने प्रयासों को यहीं विराम नहीं दिया है। वह अपनी इस नौकरी को अंतिम मंजिल मानने के बजाय अपने जीवन के सफर का एक अहम पड़ाव मानती हैं।

पुलिस विभाग की तमाम जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाने के साथ-साथ वह समय निकालकर यूपीएससी की तैयारी में जुटी हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि ज्ञान अर्जित करने और खुद को हर दिन बेहतर बनाने की कोई उम्र नहीं होती है।

समाज के लिए संदेश

जीवन में आगे बढ़ने के लिए लगातार सीखते रहना सबसे ज्यादा जरूरी है। उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि यदि माता-पिता का पूरा सहयोग और खुद की सच्ची मेहनत मिल जाए, तो हमारे गांवों की बेटियां भी सफलता की नई इबारत लिख सकती हैं।

उनकी यह शानदार उपलब्धि समाज को यह साफ संदेश देती है कि यदि बेटियों को पूरा प्रोत्साहन और सही अवसर दिए जाएं, तो वे परिवार का गौरव बढ़ाने के साथ-साथ पूरे समाज के लिए एक मिसाल बन सकती हैं।

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