Gen Z के लिए अनूठी दिवाली, पटाखों के शोर से दूर मिथिलांचल की हुक्का पाती परंपरा
Gen Z Hukka Pati Diwali: मिथिलांचल के बेनीपुर में दिवाली पर हुक्का-पाती जलाने की एक अनोखी और शांतिपूर्ण परंपरा है, ...और पढ़ें
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संठी यानी पटसन के सूखे डंठल और खर से बनी हुक्का-पाती की लपटें गांवों की गलियों को रोशन करती हैं।
शैलेंद्र कुमार झा, बेनीपुर (दरभंगा)। Mithilanchal Hukka Pati Diwali: दिवाली की शाम जहां पूरा देश आतिशबाजी के शोर और इलेक्ट्रॉनिक लाइट की जगमग में डूब जाता है, वहीं देश का एक कोना ऐसा है जहां सबसे अलग ढंग से दीपावली मनाई जाती है।
यहां शोर से अधिक शांति होती है और यह मिथिलांचल की हुक्का-पाती वाली अनोखी दिवाली है। यह आधुनिक दौर की जेन जी पीढ़ी के लिए एक बिल्कुल नया, अद्भुत और भावुक कर देने वाला अनुभव है।
दीपावली की रात जब घर-आंगन दीपों से जगमगाते हैं, तब मिथिलांचल के बेनीपुर के गांवों में एक बिल्कुल अलग ही परंपरा देखने को मिलती है।

पटाखों की कानफोड़ू आवाज से कोसों दूर, संठी यानी पटसन के सूखे डंठल और खर से बनी हुक्का-पाती की लपटें गांवों की गलियों को रोशन करती हैं।
दीपावली के अवसर पर उक्का-पाती जलाने की यह परंपरा हमारी ग्रामीण संस्कृति की ऐसी अनूठी पहचान है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना रुके आगे बढ़ रही है।
अनूठा लोकजीवन
हुक्का-पाती तैयार करने के लिए मुख्य रूप से संठी और खर का इस्तेमाल किया जाता है। ग्रामीण बहुत पहले से ही इसके लिए संठी जुटाकर सुरक्षित रख लेते हैं।
दीपावली के दिन इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खर के साथ मजबूती से बांधा जाता है और हाथ में पकड़ने लायक मशाल जैसा आकार दिया जाता
शाम होते ही युवा और बुजुर्ग इसे लेकर घरों से बाहर निकल पड़ते हैं और इसकी आग की रोशनी से पूरा गांव उत्सवमय हो जाता है।
सामूहिकता का रंग
बेनीपुर के पंडित रामनारायण झा बताते हैं कि उक्का-पाती की यह परंपरा दीपावली के उत्सव को आपसी सामूहिकता से जोड़ती है। घरों में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा संपन्न होने से पहले ग्रामीण इसे तैयार करने में जुट जाते हैं।
युवा अपने हाथों से इसे बनाने में खासी रुचि दिखाते हैं, जबकि बुजुर्ग उन्हें इसके पुराने तौर-तरीके और नियम समझाते हैं।
इससे दीपावली केवल एक धार्मिक त्योहार न रहकर पारिवारिक और सामाजिक मेलजोल का बड़ा अवसर बन जाती है।
बच्चों में उत्साह
गांव के बुजुर्ग दिनेश्वर झा, राम सुरेश झा तथा नरेश बताते हैं कि पहले दीपावली की रात उक्का-पाती का विशेष महत्व हुआ करता था। उस समय न तो आज जैसी आधुनिक रंग-बिरंगी आतिशबाजी थी और न ही बाजारों में पटाखों की कोई भरमार थी।
ग्रामीण अपने सीमित संसाधनों से ही संठी और खर की उक्का-पाती बनाते थे और बच्चे कई दिनों पहले से इसे जुटाने में लग जाते थे।
आज भले ही समय बदल चुका है और बाजार में तरह-तरह के पटाखे मौजूद हैं, फिर भी हुक्का-पाती का क्रेज आज भी बरकरार है।
क्या है विधि
मिथिला, कोसी और अंग प्रदेश में 'हुक्का-पाती' दीपावली की रात की एक बेहद प्राचीन और प्रसिद्ध लोक परंपरा है। पूजा-पाठ पूरा होने के बाद घर के सभी सदस्य पूजा घर या आंगन में जल रहे पवित्र दीपक से अपनी-अपनी हुक्का-पाती में आग सुलगाते हैं।
इसके बाद वे जलती हुई हुक्का-पाती लेकर घर के सभी कमरों, कोनों और दरवाजों पर घूमते हैं। इस दौरान सभी लोग एक स्वर में "लक्ष्मी घर, दरिद्र बाहर" का पारंपरिक उद्घोष करते हैं।
वैज्ञानिक महत्व
इस परंपरा के पीछे गहरा वैज्ञानिक और पौराणिक महत्व भी छिपा हुआ है जो आज के युवाओं को जानना चाहिए। जानकारों के अनुसार, सन या सनाठी के जलने से निकलने वाले धुएं और उसकी गर्माहट से घर तथा आसपास के छोटे हानिकारक कीट-पतंगे व बैक्टीरिया पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।
पौराणिक संदर्भों में भी इस रीति को काफी पुराना माना गया है, जो घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर शुद्धता और सकारात्मकता लाने का प्रतीक है।
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