रात में जलती है 'हुक्का-लोली', सुबह सूप पीटकर खदेड़ा जाता है दरिद्र; मिथिला में मनाई जाएगी अनोखी दीपावली
मिथिला में दीपावली पर उल्का भ्रमण, हुक्का-लोली और दरिद्र खेदना जैसी अनूठी लोक परंपराएं निभाई जाती हैं।

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HighLights
दीपावली पर मिथिला में उल्का भ्रमण की अनूठी परंपरा निभाई जाती है।
बच्चों में हुक्का-लोली खेलने का विशेष उत्साह देखा जाता है।
अगले दिन दरिद्र खेदना से घर में सुख-समृद्धि की कामना।
संवाद सहयोगी, दरभंगा। दीपावली पर दीप जलाना और लक्ष्मी-गणेश की पूजा करना देशभर की परंपरा है, लेकिन मिथिला में इस पर्व से जुड़ी कुछ ऐसी लोक परंपराएं भी हैं, जो इसे विशिष्ट पहचान देती हैं।
दीपावली की रात यहां जलती हुई उल्का लेकर भ्रमण किया जाता है। हुक्का-लोली की परंपरा का अलग महत्त्व है। दीपावली की अगली सुबह महिलाएं सूप पीटकर दरिद्र को घर से बाहर करने की कामना करती हैं।
इन परंपराओं में मिथिला की धार्मिक आस्था, पितरों के प्रति श्रद्धा और सुख-समृद्धि की लोक कामना समाहित है। ज्योतिषाचार्य राघवनाथ झा कहते हैं कि मिथिला में दीपावली के अवसर पर सबसे पहले घर के गोसाईं घर अर्थात कुलदेवता के पूजास्थल में विशेष पूजा-अर्चना की पुरानी परंपरा है।
इसके साथ ही घर के मुख्य द्वार, आंगन, तुलसी चौरा, दलान और अन्य स्थानों पर दीप जलाए जाते हैं। गोसाईं घर की पूजा परिवार की परंपरा और पूर्वजों से जुड़े संस्कारों का आज भी स्मरण कराती है।
दीपावली की रात ‘उल्का भ्रमण’ की परंपरा प्रचलित है, जिसे स्थानीय भाषा में उक फेरना या उक्का-पाती कहा जाता है। खर, संठी और पटुआ आदि से तैयार उल्का को जलाकर घर के आसपास घुमाया जाता है।
मिथिला में मान्यता है कि महालय और पितृपक्ष में आए पितरों को इस प्रकाश के माध्यम से विदाई दी जाती है। इस अवसर पर परंपरागत उल्का भ्रमण मंत्र का पाठ भी किया जाता है।
बच्चों में हुक्का-लोली की परंपरा
बच्चों में हुक्का रोली की परंपरा को लेकर भी विशेष उत्साह रहता है। पुराने कपड़ों से बनी जलती हुई गेंद या मशाल के साथ बच्चे इससे खेलते हैं। यह मिथिला की दीपावली से जुड़ी विशिष्ट लोकपरंपरा है।
मंगलकामना है दरिद्र खदेड़ना
दीपावली के अगले दिन प्रातःकाल ‘दरिद्र खेदना’ की परंपरा निभाई जाती है। महिलाएं संठी से सूप पीटते हुए कहती हैं ‘अन-धन लक्ष्मी घर आऊ, दरिद्र बाहर जाऊ’ इसके माध्यम से घर में अन्न, धन, सुख और समृद्धि के आगमन तथा दरिद्रता के निष्कासन की मंगलकामना की जाती है।
मिथिला की ये परंपराएं बताती हैं कि दीपावली केवल दीपों और सजावट का पर्व नहीं है। इसमें पितरों के प्रति सम्मान, कुलदेवता की आराधना, लोकजीवन की सहज अभिव्यक्ति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना एक साथ समाहित है।
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