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बेंगलुरु से ऑटो से पूर्वी चंपारण पहुंचा परिवार, छठ के प्रति आस्था ने दिलाई साइकिल गर्ल के जज्बे की याद

Published: Sun, 08 Nov 2026 05:55 AM (IST)

Bengaluru To Motihari Auto Journey: बेंगलुरु से एक परिवार ने छठ पूजा के लिए ट्रेन टिकट न मिलने पर लगभग ...और पढ़ें

छठ पर घर पहुंचने की तड़प के आगे रास्ते के जोखिम और शारीरिक परेशानियां भी घुटने टेक देती हैं।

छठ पर घर पहुंचने की तड़प के आगे रास्ते के जोखिम और शारीरिक परेशानियां भी घुटने टेक देती हैं।

HighLights

  1. बेंगलुरु से पूर्वी चंपारण तक 2200 किमी ऑटो यात्रा।

  2. छठ पूजा के लिए परिवार का अटूट संकल्प और आस्था।

  3. इस यात्रा ने 'साइकिल गर्ल' ज्योति की याद दिलाई।

डिजिटल डेस्क, दरभंगा। Bihar Migrants Determination: बिहार के लोगों के लिए छठ सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि उनके जीवन का मूल आधार है।

अपने संकल्प और निश्चय को पूरा करने के लिए बिहारी किसी भी हद से गुजरने का माद्दा रखते हैं। छठ के पावन अवसर पर घर पहुंचने की तड़प के आगे रास्ते के जोखिम और शारीरिक परेशानियां भी घुटने टेक देती हैं।

बेंगलुरु से ऑटो का हैरतअंगेज सफर

ट्रेन में कन्फर्म टिकट न मिलने पर पूर्वी चंपारण के अरेराज के रहने वाले सुरेंद्र और वीरेंद्र ने बेंगलुरु से ऑटो ही बुक कर लिया। लगभग 2200 किलोमीटर लंबा यह जानलेवा सफर तय कर परिवार संग मोतिहारी पहुंचने की ललक देखकर रास्ते के राहगीर और देवरिया पुलिस भी हैरान रह गई।

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छठी मइया के अर्घ्य की धुन

चार लोग बिना आराम की परवाह किए दिन-रात नेशनल हाईवे पर एक छोटे से ऑटो से बढ़ते रहे। कमर तोड़ थकान और मौसम की मार भी उनके हौसले को नहीं डिगा सकी।

जब ऑटो पूर्वी चंपारण के ऐतिहासिक सोमेश्वर नाथ मंदिर के पास पहुंचा तो सफर खत्म होने के सुकून से उनके चेहरे खिल उठे।

साइकिल गर्ल ज्योति की आई याद

प्रवासियों के इस हैरतअंगेज जज्बे ने एक बार फिर दरभंगा की 'साइकिल गर्ल' ज्योति कुमारी की यादें ताजा कर दीं।

कोरोना काल के लॉकडाउन में ज्योति अपने बीमार पिता को गुरुग्राम से साइकिल पर बैठाकर 1100 किलोमीटर का सफर तय कर दरभंगा पहुंची थी। यह घटना भी बिहार के लोगों की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक बनी।

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संघर्षों के बीच जीवन की जंग

1100 किलोमीटर साइकिल चलाकर मिसाल कायम करने वाली ज्योति कुमारी आज आर्थिक तंगी और दुश्वारियों से जूझ रही हैं। मई 2021 में पिता के निधन के बाद परिवार पर आर्थिक संकट गहरा गया। नेताओं और संस्थाओं के किए वादे हवा हो गए, जिससे ज्योति की पढ़ाई भी बीच में ही रुक गई।

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वतन की मिट्टी में मिला सुकून

ज्योति की विपरीत परिस्थितियों की तरह ही इस परिवार का सफर भी किसी बड़े संघर्ष से कम नहीं रहा। तमाम आर्थिक और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद जब प्रवासियों के कदम अपने गांव की मिट्टी पर पड़े, तो सारे कष्ट काफूर हो गए। यही संकल्प शक्ति और छठ की अटूट आस्था बिहारियों की असल पहचान है।

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