बिहार के 211 डिग्री कालेजों की शिक्षक बहाली पर संकट, यूजीसी के पाले में पहुंचा मामला
बिहार में 2532 असिस्टेंट प्रोफेसरों की संविदा बहाली में अनियमितताओं का मामला अब केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय तक पहुंच गया है। ...और पढ़ें

इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।
HighLights
2532 असिस्टेंट प्रोफेसरों की संविदा बहाली में अनियमितता का आरोप।
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने शिकायत यूजीसी को जांच हेतु भेजी।
यूजीसी नियमों के उल्लंघन से बहाली पर कानूनी संकट।
प्रिंस कुमार, दरभंगा। बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग की ओर से सूबे के 211 नव-स्थापित डिग्री कालेजों में छह विषयों के लिए 2532 पदों पर की गई असिस्टेंट प्रोफेसरों की संविदा बहाली का विवाद अब सर्वोच्च शैक्षिक गलियारों तक पहुंच गया है।
भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने इस पूरी प्रक्रिया में अनियमितताओं और नियमों की अनदेखी के खिलाफ दायर की गई शिकायत पर संज्ञान लिया है।
मंत्रालय ने अपने आधिकारिक आदेश में मामले को त्वरित जांच और आवश्यक कार्रवाई के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली को अग्रसारित कर दिया है।
यह शिकायत डा. रघुबर प्रसाद सिंह की ओर से 17 अगस्त 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के समक्ष दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता ने आयोग पर आरोप लगाया है कि यह संविदा बहाली प्रक्रिया विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित सभी अनिवार्य मापदंडों और वैधानिक नियमों का खुला उल्लंघन करके पूरी की गई है, इस कारण राज्य के कई योग्य एवं अनुभवी अभ्यर्थी चयन प्रक्रिया से पूरी तरह वंचित रह गए हैं। शिकायत में इसे विवादास्पद बहाली बताया गया है। परिणामों को तत्काल प्रभाव से रद करने की मांग की गई है।
यूजीसी रेगुलेशन 2018 (टेबल थ्री-ए) का हुआ उल्लंघन
शिकायत में बताया गया है कि आयोग ने संविदा बहाली में अंकों के निर्धारण के लिए यूजीसी के निर्धारित टेबल थ्री-ए के प्रावधानों को दरकिनार किया।
एक पूर्णकालिक और उच्च शोधपरक कोर्स पीएचडी के लिए निर्धारित 30 अंकों को मनमाने ढंग से कम कर दिया गया, जबकि महज पात्रता परीक्षा 'नेट/जेआरएफ' के अंकों को बढ़ाकर पांच या सात अंक कर दिया गया, जिससे एक विशेष वर्ग को अनुचित लाभ मिला। जबकि अकादमिक दृष्टि से पीएचडी पूर्णकालिक पाठ्यक्रम है और नेट केवल उसमें प्रवेश का प्रारंभिक आधार है।
अकादमिक रिकार्ड के मूल्यांकन में मनमानी
चयन प्रक्रिया के दौरान 10 वीं और 12 वीं कक्षाओं के अंकों को प्रतिशत के रूप में जोड़ दिया गया, जबकि यूजीसी के नियमों में इसका कोई दूर-दूर तक प्रावधान नहीं है।
देश भर के विभिन्न शिक्षा बोर्डों की मूल्यांकन प्रणालियां और अंक देने के तरीके अलग-अलग होने के कारण, यूजीसी केवल स्नातक यानी ग्रेजुएशन और स्नातकोत्तर यानी पोस्ट ग्रेजुएशन के अंकों को ही संतुलित और न्यायसंगत मापदंड मानती है।
शोध पत्र और शैक्षणिक अनुभव की उपेक्षा
इस पूरी बहाली प्रक्रिया में अभ्यर्थियों के शोध पत्रों, शिक्षण अनुभव तथा अन्य अकादमिक उपलब्धियों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। नियमित शिक्षकों की बहाली के तय नियमों से अलग जाकर पूरी तरह मनमाने नियम बनाए गए।
यूजीसी रेगुलेशन 2018 के क्लाज 13.0 के निर्देश के अनुसार, विश्वविद्यालयों या कालेजों में संविदा पर बहाली की अधिकतम सीमा केवल 10 प्रतिशत तक ही हो सकती है, लेकिन इस प्रक्रिया में नियमों को ताक पर रखकर सीधे 100 प्रतिशत रिक्तियों पर संविदा बहाली कर दी गई।
संवैधानिक और कानूनी पहलू
शिकायत में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि संविधान के सातवीं अनुसूची के तहत उच्च शिक्षा संघ सूची (प्रविष्टि-66) का विषय है। इसलिए देश भर में उच्च शिक्षा के कोर्स, गुणवत्ता और बहाली के मापदंड तय करने का सर्वाधिकार केवल और केवल यूजीसी के पास है।
राज्य सरकार या आयोग को पीएचडी और नेट की अर्हता या अंकों के निर्धारण में अपनी तरफ से बदलाव करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इसके अलावा, टेबल थ्री-ए के प्रावधानों के तहत संविदा बहाली केवल विश्वविद्यालय स्तर पर स्थायी व्यवस्था लागू होने तक एक अस्थायी विकल्प के रूप में की जानी थी।
बता दें कि देश के कई अन्य राज्यों में इसी प्रकार के नियमों का उल्लंघन कर की गई संविदा बहालियों को न्यायालयों द्वारा पहले ही अवैध घोषित किया जा चुका है। अब केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा इस मामले को सीधे यूजीसी को सौंपे जाने के बाद बिहार की इस बड़ी संविदा बहाली प्रक्रिया पर गंभीर कानूनी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
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