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पिता के सपनों को बनाया संकल्प, B.Ed टॉपर बक्सर की अक्षरा सिंह बनीं टीचर; अब IAS बनने का लक्ष्य

Published: Sat, 31 Oct 2026 08:59 PM (IST)

डुमरांव की अक्षरा सिंह ने बीएड में टॉप कर सरकारी शिक्षिका बनकर अपने पिता का सपना पूरा किया है।

अक्षरा सिंह। (जागरण)

अक्षरा सिंह। (जागरण)

HighLights

  1. अक्षरा सिंह ने बीएड में संस्थान में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

  2. सरकारी शिक्षिका बनकर पिता के सपनों को पंख लगाए।

  3. अब भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित होने का लक्ष्य है।

संवाद सहयोगी, डुमरांव (बक्सर)। बेटियां अगर ठान लें, तो कोई भी मंजिल उनसे दूर नहीं रह सकती। जरूरत है उन्हें अवसर, संस्कार और आगे बढ़ने का हौसला देने की।

डुमरांव के छठिया पोखरा निवासी अक्षरा सिंह इसकी प्रेरक मिसाल हैं। कभी विद्यालय में टॉपर बनकर अपनी प्रतिभा साबित करने वाली अक्षरा ने बीएड में पूरे संस्थान में प्रथम स्थान हासिल किया और आज सरकारी शिक्षिका बनकर विद्यार्थियों का भविष्य संवार रही हैं।

अब उनका अगला लक्ष्य भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर समाज के लिए व्यापक स्तर पर योगदान देना है। अक्षरा ने शैक्षणिक यात्रा के दौरान दसवीं में विद्यालय में प्रथम स्थान हासिल किया।

इंटरमीडिएट और स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सभापति मिश्रा इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन में बीएड में दाखिला लिया। यहां दो वर्षों की मेहनत और समर्पण से पूरे संस्थान में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

पिता के सपनों को बनाया जीवन का संकल्प

अक्षरा सिंह अपनी सफलता का सबसे बड़ा श्रेय अपने पिता स्व डॉ. बालेश्वर सिंह को देती हैं। उनके दिए संस्कार, अनुशासन, प्रेरणा और शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच ने अक्षरा को हर चुनौती से लड़ने की ताकत दी।

पिता आज भले ही उनके बीच नहीं हैं, लेकिन उनके सपने और सीख अक्षरा के जीवन का मार्गदर्शन कर रहे हैं। वह अपनी प्रत्येक उपलब्धि पिता को समर्पित करती हैं।

गुरु के विचारों ने दिखाई शिक्षा की राह

बीएड संस्थान के प्रेसिडेंट चंदन कुमार मिश्र के मार्गदर्शन ने अक्षरा के व्यक्तित्व और शैक्षणिक सोच को नई दिशा दी। उनका मानना है कि शिक्षा केवल सूचनाओं और डिग्रियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि ज्ञान का व्यवहार में उपयोग ही उसे सार्थक बनाता है।

वर्तमान में अक्षरा उच्च माध्यमिक विद्यालय मधेपुरा में विज्ञान शिक्षिका हैं। दीपावली पर दैनिक जागरण के विशेष अभियान 'लक्ष्मी मेरी लाडो' के तहत अक्षरा की कहानी संदेश देती है कि बेटियों को विश्वास और अवसर मिले तो वे अपने परिवार के सपनों को ही नहीं, समाज की उम्मीदों को भी नई उड़ान दे सकती हैं।

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