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मां दुर्गा की प्रतिमा में क्यों मिलाई जाती है वेश्यालय की मिट्टी? सदियों पुरानी परंपरा का रहस्य

Published: Mon, 12 Oct 2026 12:23 PM (IST)

दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की प्रतिमा निर्माण में वेश्यालय की चौखट की मिट्टी के उपयोग की सदियों पुरानी परंपरा ...और पढ़ें

वेश्यालय की चौखट की मिट्टी से जुड़ी मान्यता

वेश्यालय की चौखट की मिट्टी से जुड़ी मान्यता

HighLights

  1. वेश्यालय की मिट्टी का उपयोग एक प्राचीन परंपरा।

  2. यह परंपरा समाज में समानता का संदेश देती है।

  3. सप्तमृत्तिका में भी इस मिट्टी का विशेष महत्व।

जागरण संवाददाता,आरा, भोजपुर। दुर्गा पूजा केवल मां दुर्गा की आराधना और महिषासुर पर विजय का पर्व नहीं है, बल्कि यह समाज को समानता, सम्मान और समावेशिता का संदेश भी देता है। मां दुर्गा की प्रतिमा के निर्माण से जुड़ी एक ऐसी परंपरा है, जो हर साल चर्चा में आती है।

मान्यता है कि मां की प्रतिमा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी में वेश्यालय की चौखट या आंगन की मिट्टी भी शामिल की जाती है। आखिर इस परंपरा के पीछे क्या धार्मिक मान्यता है और इसका सामाजिक संदेश क्या है? आइए जानते हैं।

वेश्यालय की मिट्टी के बिना अधूरी क्यों मानी जाती है प्रतिमा?

बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए वेश्यालय की चौखट की मिट्टी का इस्तेमाल किए जाने का उल्लेख मिलता है।

इस परंपरा को लेकर अलग-अलग धार्मिक और लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। इसे केवल प्रतिमा निर्माण की एक रस्म के रूप में नहीं, बल्कि समाज के उन वर्गों को सम्मान देने के प्रतीक के तौर पर भी देखा जाता है, जिन्हें अक्सर उपेक्षा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

हालांकि, यह मान्यता सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं है। बिहार समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में दुर्गा प्रतिमा निर्माण की स्थानीय परंपराएं अलग हो सकती हैं।

सप्तमृत्तिका की परंपरा में छिपा है खास महत्व

मां दुर्गा की प्रतिमा के निर्माण में अलग-अलग स्थानों की मिट्टी मिलाने की परंपरा को कुछ धार्मिक परंपराओं में सप्तमृत्तिका से जोड़ा जाता है।

सप्तमृत्तिका का सामान्य अर्थ सात प्रकार की मिट्टी से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन मिट्टियों का चयन प्रकृति, जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं के प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से जुड़ा है।

प्रतिमा निर्माण में मिट्टी का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इसी से मां दुर्गा के स्वरूप को आकार दिया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में मिट्टी के चयन, मिश्रण और प्रतिमा निर्माण की विधि में अंतर देखने को मिलता है। इसलिए सप्तमृत्तिका में शामिल स्थानों की सूची भी परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

क्या है वेश्यालय की चौखट की मिट्टी से जुड़ी मान्यता?

इस परंपरा से जुड़ी एक लोकमान्यता के अनुसार, वेश्यालय में प्रवेश करने वाला व्यक्ति अपनी पवित्रता और पुण्य चौखट के बाहर छोड़ देता है। इसी विश्वास के आधार पर वहां की मिट्टी को प्रतिमा निर्माण के लिए विशेष महत्व दिए जाने की बात कही जाती है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक धार्मिक लोकविश्वास है, न कि प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य। इस मान्यता की व्याख्या भी अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और विद्वानों के बीच भिन्न हो सकती है। इसके बावजूद, यह परंपरा दुर्गा पूजा से जुड़ी चर्चाओं में अपनी अलग जगह रखती है।

समाज के हर वर्ग को सम्मान देने का संदेश

वेश्यालय की मिट्टी को प्रतिमा निर्माण में शामिल करने की परंपरा की एक सामाजिक व्याख्या समावेशिता से जुड़ी है। इसके जरिए यह संदेश देखा जाता है कि समाज के किसी भी वर्ग को केवल उसके पेशे या सामाजिक स्थिति के आधार पर तिरस्कृत नहीं किया जाना चाहिए।

दुर्गा पूजा शक्ति, न्याय और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। ऐसे में इस परंपरा को सामाजिक भेदभाव पर सवाल उठाने और हर व्यक्ति की गरिमा को स्वीकार करने के नजरिये से भी समझा जाता है।

हालांकि, इस सामाजिक अर्थ को परंपरा की एक व्याख्या के रूप में देखना चाहिए, क्योंकि इसका एकमात्र प्रमाणित अर्थ तय नहीं है।

सात स्थानों की मिट्टी का भी बताया जाता है महत्व

कुछ पारंपरिक विवरणों में प्रतिमा निर्माण के लिए सात अलग-अलग स्थानों की मिट्टी का उल्लेख मिलता है। इनमें गोशाला, घुड़साल, हाथीशाला, नदी के संगम, सांप की बांबी या दीमक के टीले, राजद्वार अथवा राजभवन और तालाब या सरोवर के किनारे की मिट्टी शामिल बताई जाती है।

इन स्थानों को धार्मिक और प्रतीकात्मक महत्व से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, विभिन्न क्षेत्रों की परंपराओं में इनकी सूची और व्याख्या अलग हो सकती है। इसलिए सप्तमृत्तिका के सभी रूपों को एक ही मानक सूची के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

दुर्गा पूजा की परंपरा में आस्था के साथ सामाजिक संदेश

मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने की परंपराएं भारतीय धार्मिक संस्कृति की विविधता को सामने लाती हैं। मिट्टी के चयन से लेकर प्रतिमा के निर्माण और पूजा तक, हर चरण में स्थानीय मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं की भूमिका रहती है।

वेश्यालय की चौखट की मिट्टी से जुड़ी मान्यता इसी विविध परंपरा का एक चर्चित उदाहरण है। इसे धार्मिक लोकविश्वास के साथ-साथ सामाजिक सम्मान और समानता पर विचार करने के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है।

दुर्गा पूजा का व्यापक संदेश यही है कि शक्ति, न्याय और गरिमा का सम्मान समाज के हर वर्ग के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।

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