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पति को परदेस से बुलाया, खुद बनीं 'विद्या दीदी': लाइब्रेरी चलाकर शिक्षा की अलख जगा रहीं भोजपुर की ममता

Published: Fri, 16 Oct 2026 02:56 PM (IST)

भोजपुर की ममता देवी, जिन्हें 'विद्या दीदी' के नाम से जाना जाता है, जीविका समूह से जुड़कर अपने गांव में शिक्षा की अलख जगा रही हैं।

जीविका की विद्या दीदी ममता: 1660 बच्चों को शिक्षा और करियर की राह दिखाती एक प्रेरणादायक कहानी

जीविका की विद्या दीदी ममता: 1660 बच्चों को शिक्षा और करियर की राह दिखाती एक प्रेरणादायक कहानी

HighLights

  1. जीविका से जुड़कर ममता देवी बनीं 'विद्या दीदी'।

  2. सामुदायिक पुस्तकालय में 1660 बच्चों को दिया करियर मार्गदर्शन।

  3. ऑटो रिक्शा और मानदेय से परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरी।

अरुण प्रसाद, आरा। नवरात्र में जहां नौ देवियों की आराधना हो रही है, वहीं धरती पर भी एक विद्या की देवी अपने गांव में शिक्षा की अलख जगा रही है। ये कहानी है भोजपुर जिले के पीरो प्रखंड के जितौरा जंगल महाल पंचायत के सुंदर टोला गांव की ममता देवी उर्फ विद्या दीदी की।

जीविका के कविता स्वयं सहायता समूह से जुड़ने से पहले ममता का परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। पति नंद जी शर्मा रोजगार के लिए नासिक और गुजरात में वेल्डिंग का काम करते थे। ममता कुछ अपना करना चाहती थीं।

जनवरी 2021 में समूह से जुड़ने के बाद 2022 में ममता ने 30,000 रुपये कर्ज लेकर खेती शुरू की। समय पर कर्ज चुकाया तो हौसला बढ़ा। 2024 में फिर समूह से 70,000 रुपये लेकर सेकेंड हैंड ऑटो रिक्शा खरीद लिया।

इसके बाद पति ने परदेश छोड़ दिया और अब गांव में ही ऑटो चलाकर परिवार के साथ रहते हुए महीने के 10 हजार रुपये तक कमा लेते हैं। इसी बीच पीरो प्रखंड में जीविका द्वारा सामुदायिक पुस्तकालय सह कैरियर विकास केन्द्र खोले जाने की सूचना मिली।

ममता ने विद्या दीदी के पद के लिए आवेदन किया और चयन के बाद अप्रैल 2023 से नारी जीविका महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति द्वारा संचालित लाइब्रेरी में विद्या दीदी के रूप में काम करने लगीं।

40 से 45 बच्चे रोज आते हैं पढ़ने

आज ममता की पहचान गांव में उम्मीद की किरण के रूप में है। वह सप्ताह में छह दिन सुबह नौ से शाम पांच बजे तक लाइब्रेरी में बच्चों को मार्गदर्शन देती हैं।

क्विज, ग्रुप डिस्कशन, अत्याधुनिक तकनीक से पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरने से लेकर करियर काउंसलिंग तक, हर काम ममता संभालती हैं।

उनके प्रयास से अब तक 1660 विद्यार्थियों का निबंधन हो चुका है और रोज 40 से 45 बच्चे लाइब्रेरी आते हैं। कई बच्चे उनकी मदद से नौकरी भी पा चुके हैं।

मानदेय से बनीं लखपति दीदी

पहले जहां परिवार में आमदनी का कोई स्थायी जरिया नहीं था, अब विद्या दीदी के रूप में 6,000 रुपये मानदेय और आटो से 10,000 रुपये की कमाई से परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर गई है। ममता अब जीविका की लखपति दीदी बन चुकी हैं।

ममता कहती हैं, 'पुस्तकालय ने ग्रामीण बच्चों को शांतिपूर्ण माहौल दिया है। जीविका ने मुझे शिक्षा की अलख जगाने का मौका दिया। मेरा सपना है कि मेरे मार्गदर्शन में यहां के बच्चे उच्च शिक्षा लेकर अच्छी नौकरी करें और गरीबी से बाहर निकलें।'

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