जब पेट्रोमैक्स की रोशनी में 'बिदेसिया' देखने उमड़ता था पूरा आरा, 7 दशक पुरानी है मीरगंज के 'नाच' की परंपरा
आरा में दशहरा के दौरान भिखारी ठाकुर के 'बिदेसिया' जैसे नाटकों की 70 साल पुरानी सांस्कृतिक परंपरा रही है।

भिखारी ठाकुर। (जागरण)
HighLights
आरा में दशहरा पर भिखारी ठाकुर की 70 साल पुरानी सांस्कृतिक परंपरा।
भिखारी ठाकुर के नाटक 'बिदेसिया' का मंचन होता था।
पेट्रोमैक्स की रोशनी में समाज सुधारक प्रस्तुति होती थी।
जागरण संवाददाता, आरा। दशहरा, दीपावली, छठ आदि पर्वों का भोजपुरी संस्कृति से गहरा जुड़ाव रहा है। खासतौर पर दशहरा केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्व के रूप में मनाया जाता है।
आरा में नवरात्र के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दौर रहा है। लोक कला का ध्वजवाहक, नवजागरण का संदेशवाहक और समाज सुधारक भिखारी ठाकुर भी यहां के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनते थे।
'बिदेशिया' समेत स्वरचित अपने नाटकों के जरिए समाज में गहराई से जड़ जमा चुकी कुरीतियों पर करारा प्रहार करते थे। लगभग 70 साल पहले पेट्रोमैक्स की रोशनी में उनके नाटकों का मंचन होता था।
मीरगंज स्थित रामध्यान सिंह के हाता में दशहरा के अवसर पर आयोजित होने वाले उनके नाच और नाटकों को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते थे।
शहरवासियों के साथ-साथ पीरो, बड़हरा, कोईलवर, जगदीशपुर और बिहिया जैसे दूर-दराज के प्रखंडों से भी लोग आते थे। इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक परंपरा की शुरुआत लगभग सात दशक पहले हुई थी।
यहां प्राचीन काल से ही विजयादशमी पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती थी। स्थानीय निवासी केश रंजन सिंह ने बताया कि मेरे पिता बालेश्वर सिंह ने अपने एक मित्र के माध्यम से भिखारी ठाकुर को कार्यक्रम प्रस्तुत करने का निमंत्रण भेजा था।
शुरुआत में भीड़ नियंत्रण की आशंका के चलते भिखारी ठाकुर थोड़े झिझके, लेकिन आयोजकों द्वारा सुरक्षा और बेहतर व्यवस्था के आश्वासन के बाद वे अपनी मंडली का साथ सप्तमी के दिन आरा पहुंचे। यहां की शानदार व्यवस्था से प्रभावित होकर उन्होंने तीन दिनों तक अपनी कला का जादू बिखेरा।
इसके बाद वर्षों तक यह परंपरा कायम रही। हर साल दशहरा में सप्तमी, अष्टमी और नवमी की रात करीब आठ बजे पेट्रोमेक्स (गैस) की रोशनी में कार्यक्रम शुरू होता था, जो सुबह पांच बजे तक निर्बाध रूप से चलता था। शुरुआत में हाता के दक्षिण-पूर्व हिस्से में अस्थायी मंच बनाया जाता था, जिसे बाद में स्थायी पक्के मंच का रूप दे दिया गया।
भिखारी ठाकुर के मरणोपरांत भी कायम रही परंपरा
18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर गांव में जन्मे भिखारी ठाकुर सामाजिक कुरीतियों को बखूबी समझते थे। उन्होंने बिदेसिया, बेटी बेचवा, गबरघिचोड़, विधवा विलाप, भाई विरोध और गंगा स्नान जैसे कालजयी नाटकों के माध्यम से समाज को झकझोर कर रख दिया।
10 जुलाई 1971 को उनके निधन के बाद भी उनके भतीजे के नेतृत्व में इस मंडली ने मीरगंज में परंपरा को कायम रखी।
यह भी पढ़ें- कोरोना में छूटी नौकरी, अब भागलपुर की स्वीटी ने खड़ा किया 20 लाख का कारोबार, 20 महिलाओं को दिया रोजगार
