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बिहार में 1994 से कटाव झेल रहा राघोपुर, करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं निकला स्थायी समाधान

Published: Thu, 17 Sep 2026 05:35 PM (IST)

राघोपुर 1994 से गंगा के कटाव का दंश झेल रहा है, जहां करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद स्थायी समाधान ...और पढ़ें

1994 से कटाव झेल रहा राघोपुर, करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं निकला स्थायी समाधान (फाइल फोटो)

1994 से कटाव झेल रहा राघोपुर, करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं निकला स्थायी समाधान (फाइल फोटो)

HighLights

  1. राघोपुर 1994 से गंगा के कटाव का दंश झेल रहा है।

  2. करोड़ों खर्च के बावजूद स्थायी समाधान अब तक नहीं मिला।

  3. रेलवे लाइन की सुरक्षा अब सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है।

दीपनारायण सिंह दीपक, खरीक (भागलपुर)। राघोपुर 1994 से गंगा के कटाव का दंश झेल रहा है। गंगा की धारा के दबाव में वर्षों से गांव और खेती की जमीन कटती रही है। हर साल बाढ़ और कटाव के दौरान करोड़ों रुपये की योजनाएं और फ्लड फाइटिंग कार्य किए गए, लेकिन राघोपुर को अब तक स्थायी समाधान नहीं मिल सका।

500 मीटर तटबंध ध्वस्त होने से मचा था हाहाकार

राघोपुर-काजीकोरैया जमींदारी तटबंध पर इस बार कटाव ने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। करीब 500 मीटर तटबंध ध्वस्त होने के बाद इलाके में हाहाकार मच गया था। ग्रामीणों की चिंता और हालात की गंभीरता मुख्यमंत्री तक पहुंची।

इसके बाद मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से गंगा की धारा को रोकने और राघोपुर को बचाने के लिए बड़े स्तर पर बचाव कार्य शुरू हुआ। बचाव कार्य से फिलहाल कटाव पर नियंत्रण मिला है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है। तटबंध के आगे बची जमीन और उसके बाद मौजूद रेलवे लाइन की सुरक्षा अब सबसे बड़ी चिंता है।

अब तक करोड़ों खर्च, फिर भी कटाव बरकरार

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार राघोपुर-काजीकोरैया जमींदारी तटबंध पर वर्ष 2005-06 में करीब 13 करोड़ रुपये की लागत से स्थायी कटाव निरोधी कार्य शुरू हुआ था। इसके बाद 2008 में करीब 18.77 करोड़, 2014 में करीब 67.99 करोड़ और 2015 में करीब 65 करोड़ रुपये की योजनाओं का उल्लेख मिलता है।

2016 में इस्माइलपुर-बिंदटोली और राघोपुर क्षेत्र के लिए करीब 115 करोड़ रुपये की योजना भी सामने आई थी।

एक पुराने आकलन के अनुसार, 2006 से 2019 के बीच पूरे नवगछिया अनुमंडल में स्थायी कटाव निरोधी और फ्लड फाइटिंग कार्यों पर करीब 686 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसके बावजूद राघोपुर-काजीकोरैया तटबंध हर साल गंगा के दबाव से जूझता रहा।

2026 में फिर करीब पांच करोड़ की योजना

राघोपुर को कटाव से बचाने के लिए वर्ष 2026 में भी करीब पांच करोड़ रुपये की प्राक्कलित लागत से कटाव निरोधी योजना तैयार की गई थी। लेकिन जुलाई में गंगा के तेज कटाव ने बचाव की तैयारियों की परीक्षा ले ली।

तटबंध का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ और जल संसाधन विभाग का अस्थायी कैंप कार्यालय भी गंगा में समा गया। जल संसाधन विभाग के अभियंता प्रमुख ई. वरुण कुमार ने रेलवे ट्रैक की सुरक्षा को प्राथमिकता बताते हुए अतिरिक्त संसाधन और बड़े संवेदकों को बचाव कार्य में लगाने की बात कही है।

विभाग के अनुसार नदी की मुख्य धारा तटबंध की ओर शिफ्ट होने और विक्रमशिला सेतु के अपस्ट्रीम में तेज बहाव के कारण मार्जिनल बांध पर लगातार दबाव बना हुआ था।

सवाल सिर्फ कटाव का नहीं, खर्च का भी

राघोपुर की मौजूदा स्थिति अब सिर्फ बाढ़ और कटाव का मामला नहीं रह गई है। वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी तटबंध बार-बार कमजोर पड़ रहा है। ऐसे में स्थायी समाधान को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

रेलवे लाइन तक पहुंचा संकट

राघोपुर में कटाव जिस तेजी से बढ़ा है, उसने रेलवे लाइन की सुरक्षा को भी चिंता के केंद्र में ला दिया है। यदि गंगा की धारा इसी दिशा में दबाव बनाए रखती है तो बची जमीन के साथ रेलवे परिसंपत्तियों पर भी खतरा बढ़ सकता है।

इसी बीच स्थायी समाधान की दिशा में पहल को लेकर प्रधानमंत्री के निर्देश पर बिहार के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के भागलपुर एवं राघोपुर आगमन को लेकर ग्रामीणों में उम्मीद जगी है।

वर्षों से कटाव का दंश झेल रहे लोगों को उम्मीद है कि इस बार सिर्फ तत्काल बचाव तक मामला सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राघोपुर के लिए स्थायी कटाव निरोधी समाधान की दिशा में ठोस निर्णय होगा।

सुलगते सवाल

  • क्या स्थायी कटाव निरोधी योजनाओं की तकनीकी डिजाइन बदलती नदी की धारा के अनुरूप रही?
  • क्या निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी पर्याप्त रही?
  • क्या हर साल फ्लड फाइटिंग पर होने वाले खर्च के बावजूद स्थायी सुरक्षा की प्रभावी रणनीति तैयार नहीं हो सकी?

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