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अंग से कोसी-सीमांचल तक शक्ति की गूंज, भागलपुर के चंडिका स्थान से पूर्णिया की पूरणदेवी तक प्राचीन विरासत

Published: Sat, 17 Oct 2026 04:06 PM (IST)

शारदीय नवरात्र में अंग क्षेत्र (भागलपुर, कोसी, सीमांचल) का आध्यात्मिक वैभव जीवंत हो उठता है, जहाँ प्राचीन शक्तिपीठों में देवी आराधना की समृद्ध परंपरा है।

अंग से कोसी-सीमांचल तक फैले प्रमुख देवी उपासना स्थलों की झलक।

अंग से कोसी-सीमांचल तक फैले प्रमुख देवी उपासना स्थलों की झलक।

HighLights

  1. अंग क्षेत्र में नवरात्र का आध्यात्मिक वैभव जीवंत।

  2. भागलपुर चंडिका स्थान दानवीर कर्ण से जुड़ा प्राचीन केंद्र।

  3. कोसी-सीमांचल तक फैली देवी उपासना की समृद्ध परंपरा।

ललन तिवारी, भागलपुर। गंगा की कलकल बहती लहरों के साथ गूंजती आस्था, मंदिरों से उठते देवी मंत्र और शक्ति की आराधना में पूरी तरह लीन श्रद्धालु—शारदीय नवरात्र आते ही अंग की इस पावन धरती का आध्यात्मिक वैभव जीवंत हो उठता है।

यहां देवी उपासना केवल किसी एक पर्व या कर्मकांड की परंपरा मात्र नहीं है, बल्कि यह लोकजीवन, इतिहास और साधना से जुड़ी एक ऐसी समृद्ध विरासत है, जिसकी जड़ें भागलपुर से लेकर कोसी और सीमांचल के विस्तृत भूभाग तक फैली हुई हैं।

Navratri in Anga Bhagalpur Ancient Shakti Temples (4)

शहर के प्राचीन ऐतिहासिक मंदिरों से लेकर ग्रामीण अंचल के सिद्धस्थलों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की अलौकिक आराधना की जाती है। कहीं पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चार तो कहीं बंगाल पद्धति की अनूठी शैली के बीच पूजा-अर्चना होती है, जो श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है।

बूढ़ानाथ के चंडिका स्थान से जुड़ी है दानवीर कर्ण की मान्यता

भागलपुर शहर के सुप्रसिद्ध बूढ़ानाथ मंदिर परिसर में स्थित चंडिका स्थान शक्ति उपासना का एक प्रमुख और प्राचीन केंद्र है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में दानवीर कर्ण ने मुंगेर के चंडिका स्थान से जुड़े शक्ति स्वरूप को इसी स्थान पर स्थापित किया था।

इस पौराणिक मान्यता ने इस मंदिर को एक विशिष्ट धार्मिक पहचान दी है। नवरात्र के दिनों में यहां मां के दर्शन और पूजन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

Navratri in Anga Bhagalpur Ancient Shakti Temples (3)

इसके अलावा शहर के महाशय ड्योढ़ी, ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी और कालीबाड़ी जैसे धार्मिक केंद्र भी देवी आराधना की पुरानी परंपरा को सहेजे हुए हैं। इन स्थलों पर होने वाली पूजा-पाठ में बंगाल और अंग क्षेत्र की मिली-जुली सांस्कृतिक छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

भागलपुर के शहरी क्षेत्र के साथ-साथ आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी शक्ति उपासना के कई प्राचीन और सिद्ध केंद्र मौजूद हैं। नवगछिया अनुमंडल का तेतरी दुर्गा मंदिर, नारायणपुर प्रखंड का भ्रमरपुर दुर्गा मंदिर, सुल्तानगंज के आगैवीनाथ धाम स्थित पुरानी दुर्गा स्थान तथा कहलगांव का किला दुर्गा स्थान क्षेत्रीय आस्था के बड़े और महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।

Navratri in Anga Bhagalpur Ancient Shakti Temples (2)

इसके अलावा बांका और मुंगेर जिले की सीमा पर अवस्थित तेलडीहा दुर्गा मंदिर में भी लाखों की संख्या में श्रद्धालु मत् टेकने पहुँचते हैं। नवरात्र के इन पावन दिनों में इन तमाम स्थलों पर मेलों और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।

चंपानगर की साधना परंपरा और तंत्र का संबंध

भागलपुर का चंपानगर क्षेत्र भी अपनी प्राचीन धार्मिक और साधना परंपराओं के कारण विशेष चर्चा में रहता है। पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध तारापीठ के महान तांत्रिक साधक वामा खेपा का नाम इस क्षेत्र से जुड़ी स्थानीय लोकमान्यताओं में बड़े आदर के साथ लिया जाता है।

Navratri in Anga Bhagalpur Ancient Shakti Temples (1)

ऐसी मान्यता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में चंपानगर में भी गुप्त तंत्र साधना की थी। हालांकि, इतिहास के पुख्ता दस्तावेजों में इसकी सीधी पुष्टि होना शेष है, लेकिन जनमानस की स्मृतियों और किंवदंतियों में इसका उल्लेख इस क्षेत्र की आध्यात्मिक पहचान को एक अनूठा आयाम प्रदान करता है।

पश्चिम बंगाल का तारापीठ श्मशान साधना और तांत्रिक परंपरा के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है, और वहां की साधना शैली का प्रभाव पूर्वी भारत के कई अन्य धार्मिक क्षेत्रों की लोकमान्यताओं में भी साफ झलकता है।

पूरणदेवी से लेकर उग्रतारा तक फैली है शक्ति आराधना

अंग प्रदेश की सीमा से आगे बढ़कर कोसी और सीमांचल की उपजाऊ धरती पर भी देवी उपासना का एक व्यापक संसार बसा हुआ है। पूर्णिया का ऐतिहासिक पूरणदेवी मंदिर और सहरसा जिले का उग्रतारा स्थान (महाषी) श्रद्धालुओं की अगाध आस्था और विश्वास के बड़े केंद्र हैं।

Navratri in Anga Bhagalpur Ancient Shakti Temples (6)

इसके साथ ही मुंगेर का चंडिका स्थान भी देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शुमार है। नवरात्र के इन नौ दिनों में इन सभी शक्तिपीठों और मंदिरों में दूर-दराज के जिलों और राज्यों से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं।

इस प्रकार, भागलपुर को केंद्र में रखकर देखा जाए तो अंग क्षेत्र की यह शक्ति परंपरा कोसी, सीमांचल और आसपास के तमाम धार्मिक केंद्रों के साथ मिलकर एक वृहद और सुदृढ़ आध्यात्मिक परिदृश्य का निर्माण करती है।

यहां देवी की आराधना केवल मंदिरों की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही लोकआस्था, गहरे अनुष्ठानों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अनिवार्य हिस्सा है।

अंग क्षेत्र के प्रमुख शक्ति स्थल

मंदिर / शक्ति स्थल का नाम भौगोलिक अवस्थिति प्रमुख धार्मिक विशेषता व मान्यता
चंडिका स्थान (बूढ़ानाथ) भागलपुर शहर दानवीर कर्ण द्वारा स्थापित शक्ति स्वरूप की मान्यता
तेतरी दुर्गा मंदिर नवगछिया, भागलपुर क्षेत्रीय श्रद्धा और नवरात्र में भव्य आयोजन
भ्रमरपुर दुर्गा मंदिर नारायणपुर, भागलपुर ग्रामीण आस्था और प्राचीन परंपरा का केंद्र
अজগैवीनाथ धाम दुर्गा स्थान सुल्तानगंज, भागलपुर गंगा तट पर स्थित पावन शक्ति साधना स्थल
तेलडीहा दुर्गा मंदिर बांका-मुंगेर सीमा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के जुटने का प्रसिद्ध केंद्र
पूरणदेवी एवं उग्रतारा पूर्णिया एवं सहरसा कोसी-सीमांचल के प्रमुख और सिद्ध आस्था केंद्र

अग प्रदेश की संस्कृति और अध्यात्म का चोला गंगा और शक्ति साधना के रंगों से रंगा है। बूढ़ानाथ के चंडिका स्थान से लेकर चंपानगर की तांत्रिक स्मृतियां और कोसी तक फैली यह परंपरा हमारी उस प्राचीन धरोहर का प्रतीक है, जहां आस्था ही जीवन का आधार है। 

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