विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

किराए के मकान से कृषि विज्ञानी बनने तक का सफर! BAU सबौर की डॉ. सुदेशना ने बदली तकदीर, अब मां को देना चाहती हैं घर

Published: Mon, 02 Nov 2026 04:00 AM (IST)Updated: Mon, 02 Nov 2026 05:12 AM (IST)

Success Story: डॉ. सुदेशना ने पिता के निधन और आर्थिक तंगी के बावजूद अपनी मां के त्याग व संकल्प से ...और पढ़ें

Success Story: बचपन में उठा पिता का साया, मां ने संघर्ष कर पढ़ाया; अब BAU सबौर में कनीय विज्ञानी बनीं डॉ. सुदेशना

Success Story: बचपन में उठा पिता का साया, मां ने संघर्ष कर पढ़ाया; अब BAU सबौर में कनीय विज्ञानी बनीं डॉ. सुदेशना

HighLights

  1. पिता के निधन के बाद मां के संघर्ष से मिली प्रेरणा।

  2. आईसीएआर परीक्षा में 18वीं रैंक हासिल कर बनीं वैज्ञानिक।

  3. बीएयू सबौर में कनीय विज्ञानी, मां को घर देने का सपना।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। Success Story:  यदि सिर से पिता का साया अचानक उठ जाए, तो बचपन की अबोध दुनिया में जिम्मेदारियों और आर्थिक अभावों का गहरा अंधकार छा जाना स्वाभाविक है। ऐसे विकट दौर में न केवल वर्तमान डगमगा जाता है, बल्कि संजोए गए सपनों का अस्तित्व बचाए रखना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

लेकिन यदि मां का हौसला अडिग हो और बेटी का संकल्प फौलादी, तो घोर निराशा के बीच भी उम्मीद का सवेरा होता है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर में कनीय विज्ञानी के पद पर पदस्थापित डॉ. सुदेशना की सफलता की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहाँ एक मां का निस्वार्थ त्याग, बेटी का अटूट संकल्प और शिक्षा के प्रति निष्ठा एक-दूसरे की ताकत बने।

मूल रूप से पश्चिम बंगाल के कोलकाता की रहने वाली सुदेशना जब महज पांचवीं कक्षा में पढ़ रही थीं, तभी उनके पिता संदीप दास का असामयिक निधन हो गया। पिता के जाने से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और पहले से तंग आर्थिक स्थिति और अधिक बदतर हो गई।

किराए का मकान, सीमित आमदनी और मां का फौलादी संकल्प

इस हृदयविदारक घड़ी में मां गोपा दास ने परिस्थितियों के सामने घुटने टेकने के बजाय बेटी की तकदीर संवारने का बीड़ा उठाया। उन्होंने जीवन भर किराए के एक छोटे से मकान में रहते हुए एक निजी कंपनी में अकाउंटेंट का काम संभाला। अपनी सीमित आमदनी में एक-एक पैसे की बचत कर उन्होंने घर का खर्च चलाया और कभी भी सुदेशना की पढ़ाई में आर्थिक तंगी की आंच नहीं आने दी।

मां के इसी मौन संघर्ष और त्याग ने सुदेशना को हर चुनौती से लड़ने की आंतरिक शक्ति दी। उन्होंने अभावों को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय आगे बढ़ने की सीढ़ी बनाया और 11वीं व 12वीं की पढ़ाई पूरी तरह से मेधा छात्रवृत्ति के बल पर पूरी की।

मेडिकल का सपना छूटा, तो कृषि विज्ञान में राष्ट्रीय स्तर पर चमकीं

सुदेशना का प्रारंभिक सपना मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर एक डॉक्टर बनने का था। लेकिन परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति मेडिकल के महंगे खर्च की इजाजत नहीं दे रही थी। उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया; राह बदली लेकिन मंजिल की जिद नहीं छोड़ी। उन्होंने कृषि विज्ञान को अपना मुख्य अध्ययन क्षेत्र चुना और दिन-रात एक कर दिया।

उनकी मेहनत का परिणाम तब सामने आया जब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) द्वारा आयोजित अखिल भारतीय परीक्षा में उन्होंने ऑल इंडिया 18वीं रैंक हासिल कर अपनी मेधा का लोहा मनवाया। इसके बाद देश के शीर्षस्थ संस्थानों में शुमार गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय (पंतनगर) से उन्होंने छात्रवृत्ति के सहारे एमएससी और डॉक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में वे बीएयू सबौर में कनीय विज्ञानी के रूप में कृषि अनुसंधान को नई दिशा दे रही हैं।

'अब मां को एक पक्का घर देना ही मेरी सबसे बड़ी ख्वाहिश'

सफलता के शिखर पर पहुंचने और प्रतिष्ठित विज्ञानी का मुकाम हासिल करने के बाद भी डॉ. सुदेशना के मन में एक बड़ी हसरत बाकी है। जिस मां ने अपनी पूरी जवानी और खुशियां किराए के कमरों में गुजार दीं, अब बेटी अपनी उसी मां को एक स्थायी छत देना चाहती है।

सुदेशना भावुक होकर कहती हैं, "मेरा बस एक ही सपना है कि मैं अपनी मां को उनका अपना घर उपहार में दे सकूं।" उनकी इस सादगी भरी इच्छा में मां के प्रति असीम कृतज्ञता, गहरा सम्मान और वर्षों का संघर्ष झलकता है। वे कहती हैं कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन और प्रतिकूल क्यों न हों, बेटियों को कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। यदि मन में धैर्य, स्वावलंबन और खुद पर विश्वास हो, तो बंद रास्ते भी अपने आप खुल जाते हैं।

यह भी पढ़ें- सनातन धर्म में यज्ञ का क्या है महत्व? भागलपुर में साध्वी कावेरी प्रज्ञा ने खोले कई रहस्य, कल्याण के लिए दिए यह मंत्र

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।