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10वीं में शादी, उपेक्षा और बेटे की मौत... लेकिन नहीं मानी हार; हर आघात को मात दे IIIT में Officer बनीं डॉ. अभिलाषा

Published: Wed, 04 Nov 2026 06:59 AM (IST)

Success Story of Dr Abhilasha Bharti IIIT Bhagalpur: डॉ. अभिलाषा भारती ने बाल विवाह, उपेक्षा और बेटे की असामयिक मौत ...और पढ़ें

Success Story of Dr Abhilasha Bharti IIIT Bhagalpur:

Success Story of Dr Abhilasha Bharti IIIT Bhagalpur: 

HighLights

  1. बाल विवाह, उपेक्षा और बेटे की मौत का सामना किया।

  2. अदम्य इच्छाशक्ति से पीएचडी कर बनीं सहायक कुलसचिव।

  3. ट्रिपल आइटी भागलपुर में प्रशासनिक पद पर कार्यरत हैं।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। Success Story of Dr Abhilasha Bharti IIIT Bhagalpur: जब समाज किसी स्त्री के हिस्से केवल आंसुओं और समझौतों की चहारदीवारी तय कर देता है, तब कुछ विरले व्यक्तित्व उस तय नियति को अपनी अदम्य जिद से बदल डालते हैं।

खगड़िया जिले के सुदूर पिपरा गांव की डॉ. अभिलाषा भारती की जीवन-यात्रा ऐसी ही जिजीविषा की अनूठी मिसाल है। बाल विवाह की बेड़ियां, उपेक्षा की मार और 17 साल के जवान बेटे को खोने का असहनीय आघात... जिंदगी के हर दहकते इम्तिहान पर उनकी अडिग 'अभिलाषा' भारी पड़ी।

वे वर्तमान में भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपल आइटी) भागलपुर में सहायक कुलसचिव के पद पर अपनी सेवाएं दे रही हैं। उनकी यात्रा साबित करती है कि यदि भीतर सीखने की लौ और संकल्प बना रहे, तो सबसे बड़ी त्रासदी के बाद भी जिंदगी की नई शुरुआत संभव है।

शादी के बाद थमी पढ़ाई, पर नहीं बुझी सीखने की लौ

करीब तीन दशक पहले ग्रामीण परिवेश में बेटियों की उच्च शिक्षा को लेकर सामाजिक सोच बेहद संकीर्ण थी। अभिलाषा ने बचपन में डॉक्टर बनकर समाज सेवा का सपना संजोया था, लेकिन परंपराओं की वेदी पर 10वीं के तुरंत बाद ही उनका विवाह कर दिया गया।

12वीं के बाद पढ़ाई पर पूरी तरह ताला लग गया। कम उम्र में मां बनने के कारण दोनों बच्चों और गृहस्थी का बोझ कंधों पर आ पड़ा। वैवाहिक जीवन में पति का अपेक्षित सहयोग नहीं मिला, लेकिन उन्होंने कभी घुटने नहीं टेके। अंदर जल रही आत्मनिर्भरता की लौ ने उन्हें कभी शांत नहीं बैठने दिया।

17 साल के बेटे की असामयिक मौत

डॉ. अभिलाषा बताती हैं कि चूल्हे-चौके की दिनचर्या के बीच भी बच्चों के सुनहरे भविष्य की छटपटाहट लगातार बेचैन करती थी। उन्होंने अपने माता-पिता के संबल पर गांव से शहर का रुख किया और बच्चों की अच्छी परवरिश व पढ़ाई के लिए निजी क्षेत्र में नौकरी शुरू की।

सब कुछ धीरे-धीरे पटरी पर लौट ही रहा था कि नियति ने उन्हें ऐसा जख्म दिया जो किसी भी मां को भीतर तक तोड़ दे। उनके 17 वर्षीय जवान बेटे की ब्रेन हेमरेज के कारण असामयिक मृत्यु हो गई। गहरे अवसाद और असहनीय शून्य के उस दौर में उन्होंने खुद को बिखरने नहीं दिया। अध्यात्म, ईश्वर भक्ति और श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग के उपदेशों से आत्मबल जुटाया और तय किया कि वे इस शोक को दुर्बलता नहीं, बल्कि कर्म की ऊर्जा बनाएंगी।

17 साल की निजी नौकरी और फिर प्रशासनिक मुकाम

अभिलाषा ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को कर्तव्य के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने निजी क्षेत्र में लगातार 17 वर्षों तक नौकरी करते हुए पूरे परिवार को संभाला। दिन में दफ्तर का काम निपटाना और रातों को किताबों से जूझना उनकी रोजमर्रा की साधना बन गया।

इसी अनथक परिश्रम के दम पर उन्होंने स्नातक, स्नातकोत्तर और अंततः डॉक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि हासिल की। उनकी यह तपस्या जून 2023 में रंग लाई, जब उनका चयन प्रतिष्ठित संस्थान ट्रिपल आइटी भागलपुर में सहायक कुलसचिव पद पर हुआ।

प्रशासनिक मुकाम के बाद भी जारी है साधना

उच्च प्रशासनिक पद पर पहुंचने के बाद भी डॉ. अभिलाषा के सीखने का क्रम थमा नहीं है। वे इस समय मास्टर ऑफ सोशल वर्क (एमएसडब्ल्यू) की पढ़ाई कर रही हैं, ताकि समाज की उपेक्षित और पीड़ित महिलाओं को कानूनी व सामाजिक सहारा दे सकें।

वे बताती हैं कि उन्होंने मां दुर्गा और सूर्यदेव से मन्नत मांगकर जिस बेटी को पाया था, आज वही शांभवी (जो वर्तमान में बीबीए कर रही है) उनके जीने की सबसे बड़ी शक्ति और संबल बनी हुई है।

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