भागलपुर के विक्रमशिला सेतु में अब पारंपरिक पेंटिंग से अलग प्रयोग, सिल्वर कोटिंग से जंग रोकने की तैयारी
भागलपुर के विक्रमशिला सेतु के पुनर्स्थापन कार्य में स्टील गर्डरों पर निर्माण के दौरान ही सिल्वर कोटिंग की जा रही ...और पढ़ें

भागलपुर में विक्रमशिला सेतु
HighLights
निर्माण के दौरान स्टील गर्डरों पर सिल्वर कोटिंग।
जंग से बचाव, पुल की लंबी उम्र सुनिश्चित।
आईआईटी/एनआईटी विशेषज्ञ करेंगे गुणवत्ता की जांच।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। भागलपुर के बहुप्रतीक्षित विक्रमशिला सेतु के पुनर्स्थापन (Renovation) कार्य में तकनीकी दक्षता का एक नया उदाहरण देखने को मिल रहा है। सेतु पर लांच होने वाले स्टील गर्डर पर विशेष रूप से सिल्वर कोटिंग की जा रही है, ताकि निर्माण के शुरुआती चरण से ही पुल के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार किया जा सके।
पारंपरिक तौर पर किसी भी पुल के निर्माण कार्य के पूरा होने के बाद गर्डरों पर पेंट या कोटिंग की जाती है, लेकिन विक्रमशिला सेतु के मामले में यह काम निर्माण के दौरान ही किया जा रहा है ताकि गंगा नदी के जलवाष्प और नमी वाले वातावरण में हवा, पानी व बारिश के कारण स्टील में जंग (Rust) लगने के नुकसान से बचाया जा सके।
सिल्वर कोटिंग के फायदे और लांचिंग प्रक्रिया
कारखाने से आने वाले स्टील गर्डर्स को असेंबल करने के दौरान उस पर यह जंगरोधी सिल्वर कोटिंग की जा रही है। अभियंताओं के अनुसार, यह कोटिंग गर्डर के वजन के हिसाब से की जाती है। इसके बाद जब गर्डर को सेतु के ऊपर चढ़ाया जाएगा, तब लांचिंग के समय इस पर एक और कोट सिल्वर कोटिंग की जाएगी। इस उन्नत तकनीक से स्टील की उम्र लंबी होगी और भविष्य में बार-बार होने वाले रखरखाव व रंग-रोगन के खर्च में भारी कमी आएगी।
थर्ड-पार्टी जांच और एड्हेशियन टेस्ट
सेतु पर की जा रही मेटेलिक कोटिंग की गुणवत्ता परखने के लिए कड़े मानक तय किए गए हैं:
एड्हेशियन टेस्ट: इसके जरिए यह पता लगाया जाएगा कि मेटेलिक कोटिंग स्टील की सतह पर कितनी मजबूती से जुड़ी हुई है।
माइक्रोन जांच: मैग्नेटिक या एडी करंट गेज की मदद से कोटिंग की परत के तय माइक्रोन की माप की जाएगी।
विशेषज्ञ जांच: गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच के लिए आईआईटी (IIT) और एनआईटी (NIT) के सिविल व मेटालर्जिकल इंजीनियरिंग विभागों के विशेषज्ञों को थर्ड-पार्टी एक्सपर्ट के रूप में आमंत्रित किया गया है।
आगे की कार्य योजना और लोड टेस्टिंग
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, स्टील गर्डर की लांचिंग में अभी 20 से 25 दिन का समय लग सकता है। वर्तमान में उन स्थानों पर बेयरिंग लगाने का काम तेजी से चल रहा है, जहां गर्डर को पूरी तरह सेट किया जाना है। इसके साथ ही सेतु के अन्य हिस्सों के पुराने बेयरिंग भी बदले जा रहे हैं।
गर्डर लांचिंग का काम पूरा होने के बाद स्लैबों की ढलाई की जाएगी। स्लैब ढलाई से पहले चदरा के सेंट्रिंग पर छड़ बांधे जाएंगे। पूरी ढलाई के 28 दिन बाद 100 से 125 टन वजनी वाहनों को चलाकर सेतु की लोड बेयरिंग क्षमता की कड़ी जांच कराई जाएगी। परीक्षण सफल होने के बाद ही यह मार्ग आम जनता और वाहनों के आवागमन के लिए पूरी तरह खोल दिया जाएगा।
