भागलपुर में मन्नत पूरी होने पर जमींदार ने बनवाया मां कल्याणी का मंदिर, आज भी पशुबलि की जगह चढ़ता है कोहड़ा
भागलपुर के मोहद्दीनगर स्थित मां कल्याणी दुर्गा मंदिर की स्थापना जमींदार कमलधारी लाल ने संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने ...और पढ़ें

भागलपुर के मोहद्दीनगर स्थित ऐतिहासिक मां कल्याणी दुर्गा मंदिर का परिसर और शारदीय नवरात्र पर सजा दरबार।
HighLights
जमींदार कमलधारी लाल ने संतान प्राप्ति पर मंदिर बनवाया।
पशुबलि की जगह कोहड़े की सात्विक बलि की परंपरा।
महिलाएं खींचती हैं विसर्जन रथ, डांडिया उत्सव भी।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। आस्था जब किसी गहरी मन्नत से जुड़ जाती है, तो वह केवल एक मनोकामना पूरी होने की कथा नहीं रहती, बल्कि पीढ़ियों तक अटूट रूप से चलने वाली महान परंपरा बन जाती है।
भागलपुर के मोहद्दीनगर स्थित मां कल्याणी दुर्गा मंदिर की कहानी भी कुछ ऐसी ही अनूठी प्रेरणा समेटे हुए है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, संतान प्राप्ति की कामना लेकर मां के दरबार पहुंचे जमींदार कमलधारी लाल की मुराद पूरी हुई और उनके घर बेटी ने जन्म लिया।
इस खुशी में उन्होंने भव्य मंदिर का निर्माण कराया और यहां विधिवत पूजा की परंपरा की नींव रखी। आज यह पवित्र दरबार सात्विक आराधना, विशेष महाभोग और सामुदायिक सहभागिता की अपनी खास पहचान के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात है।
जमींदार ने कराई थी मंदिर की स्थापना
स्थानीय इतिहास के मुताबिक, वर्ष 1920 में तत्कालीन जमींदार कमलधारी लाल ने संतान प्राप्ति की कामना के साथ इस स्थल पर पूजा की शुरुआत की थी। घर में बेटी का जन्म होने के बाद उन्होंने अपनी मन्नत पूरी होने पर यहां मंदिर का निर्माण करवाया।
आगे चलकर वर्ष 1952 में जब देश में जमींदारी प्रथा समाप्त हुई, तब इस ऐतिहासिक मंदिर की देखरेख और संचालन की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों ने अपने हाथों में ले ली। इसके बाद वर्ष 1953 में आधिकारिक तौर पर पूजा समिति का गठन किया गया। संतान सुख की कामना लेकर आज भी दूर-दूर से श्रद्धालु मां कल्याणी के दरबार में अपनी अर्जी लेकर पहुंचते हैं।
पशुबलि बंद कोहड़े की सात्विक बलि
इस मंदिर की सबसे बड़ी और अनुकरणीय विशेषता इसकी सात्विक परंपरा है। यहां किसी भी प्रकार की पशुबलि के स्थान पर कोहड़ा (भतुआ) की सात्विक बलि दिए जाने का विधान है। कोहड़े पर सिंदूर लगाकर पूरे विधि-विधान से धार्मिक अनुष्ठान पूरा किया जाता है।
समिति के अनुसार, वर्ष 1953 में जब पूजा समिति का गठन हुआ था, तभी सर्वसम्मति से पशुबलि जैसी कुप्रथा को पूरी तरह बंद करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया था। तभी से यह सात्विक परंपरा इस मंदिर की पहचान बन चुकी है।
12 थालियों में महाभोग 108 दीपों से महाआरती
शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार और उत्सव का माहौल है। बनारस के प्रख्यात आचार्य प्रवीण पांडे के नेतृत्व में यहां कलश स्थापना कराई गई है। पूजा प्रभारी दिलीप कुमार पाल बताते हैं कि सप्तमी से लेकर नवमी तक प्रतिदिन 108 दीप प्रज्वलित कर मां की भव्य महाआरती करने की परंपरा है।
इस वर्ष अनुष्ठान में यजमान के रूप में प्रफुल्ल चंद्र सिंह बैठे हैं। मां को दर्जन भर यानी चांदी की 12 थालियों में विशेष महाभोग अर्पित किया जाता है, साथ ही माता की प्रतिमा के लिए विशेष रूप से बनारसी साड़ी मंगाई गई है।
चार दशक पुरानी सांस्कृतिक डांडिया नृत्य
मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ सांस्कृतिक आयोजनों की भी चार दशक पुरानी समृद्ध परंपरा है। समिति के अध्यक्ष राकेश रंजन केशरी के अनुसार, नवरात्र के दौरान 16 अक्टूबर को डांडिया उत्सव, 17 अक्टूबर को बाल कलाकारों की मनमोहक प्रस्तुतियां तथा 18 से 21 अक्टूबर तक विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।
इस दौरान महाअष्टमी के मौके पर दिल्ली-गाजियाबाद के प्रसिद्ध राधेश्याम वृंदावन रसिक ग्रुप द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली नृत्य नाटिका मुख्य आकर्षण का केंद्र होगी।
महिलाओं के हाथों विसर्जन रथ खींचने की परंपरा
इस मंदिर के उत्सव का सबसे भावुक और आकर्षक पल विजया दशमी के दिन देखने को मिलता है। दशमी तिथि पर निकलने वाली मां की विसर्जन शोभायात्रा में पुरुष वर्ग के साथ-साथ भारी संख्या में महिलाएं और युवतियां शामिल होती हैं।
वे माता के विसर्जन रथ की रस्सी को अपने हाथों से खींचती हैं। उड़ते हुए अबीर-गुलाल और गूंजते जयकारों के बीच यह दृश्य गहरी धार्मिक आस्था के साथ-साथ नारी सशक्तिकरण और सहभागिता का एक अनूठा संदेश देता है।
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"मां कल्याणी का यह मंदिर हमारी पुरानी विरासत और अटूट लोक-आस्था का प्रतीक है। वर्ष 1920 से शुरू हुई यह परंपरा आज जन-सहयोग से भव्य रूप ले चुकी है। सात्विक बलि, चांदी की थालियों का महाभोग और रथ खींचने में महिलाओं की भागीदारी इस मंदिर की अनूठी विशेषता है।"
