यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 21, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
कहीं आक्सीजन की कमी से तो नहीं हो रहीं मौत
मेरठ: गोरखपुर मेडिकल कालेज की तरह कहीं मेरठ मेडिकल में भी आक्सीजन की कमी मरीजों के

मेरठ: गोरखपुर मेडिकल कालेज की तरह कहीं मेरठ मेडिकल में भी आक्सीजन की कमी मरीजों के जान गंवाने का सबब नहीं बन रही? यह सवाल किसी के भी जेहन में कौंध सकता है। गत दिनों मेडिकल कालेज के स्वाइन फ्लू वार्ड में चार मरीजों की मौत का कारण आक्सीजन सप्लाई का बंद होना बताया जा रहा है। परिजनों का आरोप था कि आक्सीजन सिलेंडर खत्म होने पर अलार्म नहीं बजा और मरीज का दम घुट गया। स्टाफ की मानें तो आडियो विजुअल अलार्म न होने से पहले भी कई मरीजों के साथ हादसा हो चुका है। इधर, आक्सीजन पाइप में प्रदूषण को फिल्टर करने वाले उपकरण हृयूमिड फॉयर में काई की परत जमी हुई मिली।
एनेस्थेसिया विशेषज्ञों की मानें तो कृत्रिम सांस पर रखे गए मरीजों पर 24 घंटे नजर रखी जानी चाहिए। मानीटर पर पल्स और बीपी की रीडिंग चलती रहती है, जबकि आक्सीजन खत्म होने से चंद मिनट पहले संबंधित वार्ड में भी अलार्म बजना शुरू हो जाता है। अगर वक्त पर आक्सीजन सप्लाई नहीं मिले तो मरीज तीन मिनट में दम तोड़ सकता है। गत दिनों मेडिकल कालेज स्वाइन फ्लू वार्ड में चार मरीजों की मौत हो गई। इनमें से तीन वेंटिलेटर पर थे। परिजनों ने आरोप मढ़ा था कि आक्सीजन खत्म होने की सूचना मेडिकल स्टाफ को दी गई किंतु किसी ने ध्यान नहीं दिया।
कई बार परिजनों को मरीजों के वार्ड से बाहर निकाल दिया जाता है, ऐसे में कृत्रिम सांस पर रखे गए मरीज की मानीट¨रग के लिए कोई नहीं रहता। तमाम हादसे इस दौरान भी हुए हैं। 'दैनिक जागरण' की टीम ने मेडिकल में आक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था की पड़ताल की। आक्सीजन पाइप में प्रदूषण को फिल्टर करने वाले यंत्र हृयूमिडफायर में काई जमा मिली। यह उपकरण आक्सीजन के साथ सांस तक पहुंचने वाले छोटे से छोटे कणों को भी सोख लेता है। आक्सीजन के फ्लो को भी बैलेंस करता है।
ब्लड में 88 फीसद तक गिरे आक्सीजन तो खतरा
मरीजों के रक्त में आक्सीजन का स्तर 88 फीसद से कम होने, तेज न्यूमोनिया, खून की बेहद कमी, ट्रामा व फेफड़ों में पानी जमा होने पर वेंटिलेटर देना पड़ता है। कई बार शरीर में आक्सीजन पहुंचती है, किंतु कार्बन डाई आक्साइड नहीं निकल पाती। रक्त का पीएच मान गिरने से मरीज गफलत में चला जाता है। रक्त में आक्सीजन का स्तर बढ़ाने के साथ ही सीओटू को रिलीज किया जाता है।
बाक्स
-व्यक्ति हर सांस में 500 एमएल आक्सीजन लेता है।
-रक्त में आक्सीजन की मात्रा 97 फीसद होना चाहिए। 75 फीसद से कम होने पर दिमाग में आक्सीजन मिलने पर दौरे पड़ते हैं।
-एयर हंगर में मरीज एप्लीनिया में चला जाता है।
-तेज न्यूमोनिया या फेफड़े में संक्रमण व सेप्सिस का मरीज तीन मिनट में मर सकता है।
-रक्त में सीओटू का स्तर 35-45, जबकि आक्सीजन 90-100 एमएम आफ मरकरी होना चाहिए।
-हवा में 21 फीसद, जबकि सियाचिन में आठ फीसद आक्सीजन होती है।
मेडिकल का हाल
-कुल-20 वेंटिलेटर
-ट्रामा आइसीयू में-13
-प्रयोग में-पांच
-आठ वेंटीलेटर पैक करके अंदर।
-बाल रोग विभाग में कुल-6
-प्रयोग में-4
-बेकार-2
-दो हजार सिलेंडर भरने की क्षमता वाला आक्सीजन प्लांट सितंबर में होगा चालू।
-प्रतिदिन 120 सिलेंडरों की खपत। मेडिकल में बेड-1060
क्या कहते हैं अधिकारी
मरीजों के लिए आक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था दुरुस्त है। हमारा स्टाफ मरीज पर पैनी नजर रखता है। अलार्म भी ठीक कराए जा रहे हैं।
डा. सुभाष दहिया, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ
