यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 02, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
प्रासंगिक : हे मृत्यु! तू अपनी जाति बता
पांचों नृशंस हत्याएं उस रायबरेली में हुईं जिस पर गांधी परिवार अपना कॉपीराइट मानता है। घटनास्थल ऊंचाहार का एक गांव ...और पढ़ें

लखनऊ (आशुतोष शुक्ल)। उत्तर प्रदेश के वीआइपी माने जाने वाले जिले रायबरेली में दो आदमी जिंदा भून दिये गए। तीन को मारने के बाद जलती कार के नीचे फेंक दिया गया गया। पांच मृतकों में तीन अत्यन्त निर्धन परिवारों से थे लेकिन, किसी को रुपल्ली भी मुआवजा न मिला। चार मृतक शादीशुदा थे जो कच्ची गृहस्थी छोड़ गए।
पांचों नृशंस हत्याएं रायबरेली के ग्रामीण अंचल में हुईं। उस शहर में हुईं जिस पर गांधी परिवार अपना कॉपीराइट मानता है। घटनास्थल ऊंचाहार का एक गांव अप्टा है। गांव राजधानी से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर है। राजधानी में सरकार बैठती है। कुछ आरोपित गिरफ्तार हुए लेकिन, मृतकों के परिवार संतुष्ट नहीं। उनके अनुसार इस बड़ी वारदात के सारे दोषी अभी नहीं पकड़े गए हैं। इसका मास्टर माइंड भी कोई और है जिसे गिरफ्तार किया जाना चाहिए।
फिर भी कहीं कोई हलचल नहीं। कोई प्रदर्शन नहीं। कोई एनजीओ धमाका नहीं। कोई मांग नहीं। कोई काला फीता नहीं और टीवी की कोई स्क्रीन भी काली नहीं। लोकतंत्र संकट में नहीं। अभिव्यक्ति को खतरा और धर्मनिरपेक्षता को भय नहीं। साहित्य के प्रगतिशील खेमे से कोई काव्यपाठ नहीं, कहीं कोई निबंध लेखन नहीं। कहीं वामपंथी उभार नहीं। पक्ष खामोश है और विपक्ष को सन्नाटा मार गया है। तीन तलाक और जौहर यूनिवर्सिटी से लेकर सेना तक हर मुद्दे पर बिना मांगे राय देने वाले आजम खां चुप हैं। क्यों? क्यों है इतनी खामोशी? क्या केवल इसलिए क्योंकि मरने वाले सवर्ण थे, ब्राह्मण थे। इस मृत्यु का शोकगीत क्या वर्ण देखकर गाया जाएगा।
जाति व्यवस्था भारतीय समाज का कलंक है। जन्म के आधार पर अपने को बड़ा मान बैठने का दंभ झूठा और सामाजिक अभिशाप है। जितना शीघ्र इससे मुक्ति पा ली जाए, उतना अच्छा। समाज उधर दौड़ भी पड़ा है परंतु दूसरा पक्ष भी उतना ही त्रासद है जहां मौत भी अब सरनेम लगाने लगी है। रायबरेली की पांच जघन्य हत्याओं का कारण संपत्ति का विवाद हो या राजनीतिक ईष्र्या और वर्चस्व की लड़ाई, इस बात को कैसे भुला दिया गया कि पांच युवाओं की सामूहिक हत्या की गई।
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सरकार के प्रभावशाली लोगों या पिछली सरकार में संरक्षण प्राप्त जिन लोगों का नाम इस घटना के पीछे आ रहा है, उनकी पड़ताल क्या केवल इसलिए नहीं होनी चाहिए कि मरने वाले कथित उच्च कुल के थे और जो अब जाति या धर्म आधारित वोट बैंक नहीं रह गए।
यही वह मुद्दा है जहां सरकारें अपना इकबाल और राजनीतिक दल अपनी विश्वसनीयता खोते हैं। न्याय की आंखों में अगर वर्गीकरण उतर आया तो उससे कुछ समय के लिए भले कुछ लोग लाभान्वित दिखें लेकिन, अंतत: तो सभी प्रभावित होते हैं।
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पुलिस का डंडा जब सबके लिए एक जैसा होगा तभी न्याय का सुशासन आएगा। क्या एक समाज के तौर पर हम इतने एकपक्षीय हो गए हैं कि मृत्यु भी हमें विचलित नहीं करती। राष्ट्रीय महापुरुषों को भी जाति के खानों में बांट चुके समाज को यह शिक्षा भी राजनीति से मिली है।
...और ऐसा शायद यहां पर इसलिए भी है कि हमारे पाठ्यक्रम से मॉरल साइंस का विषय बहुत पहले ही हटाया जा चुका है।
