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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 08, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

इंसेफ्लाइटिस रोकने के दावों में करोड़ों खर्च, मौतों का रिकार्ड टूटा

By Nawal MishraEdited By:
Published: Thu, 08 Jan 2015 06:32 PM (GMT+05:30)Updated: Thu, 08 Jan 2015 06:46 PM (GMT+05:30)

उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री, मुख्य सचिव, मिशन निदेशक और आला अधिकारियों की तैयारी बैठकों में महामारी रोकने के दावों ...और पढ़ें

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री, मुख्य सचिव, मिशन निदेशक और आला अधिकारियों की तैयारी बैठकों में महामारी रोकने के दावों को दरकिनार कर गोरखपुर के आसपास इंसेफ्लाइटिस ने भारी तबाही मचाई। इस महामारी ने 2014 में पौने सात सौ जानें लीं। 2005 के बाद इतनी बड़ी तादाद में मौतें कभी नहीं हुईं। फागिंग, टीकाकरण, शुद्ध पेयजल उपलब्धता आदि के दावों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए।

फीवर ट्रैकिंग सिस्टम के तहत यह व्यवस्था थी कि गांव स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता और आशा बहुएं बुखार वाले मरीजों का पता करके उनको जल्द से जल्द प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाएंगे। यहां तत्काल इलाज शुरू होगा। यदि स्थिति अधिक गंभीर होगी तो मरीज को इंसेफ्लाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर पहुंचाया जाएगा। यहां काबू नहीं होने पर जिला अस्पताल या गोरखपुर मेडिकल कालेज रेफर किया जाएगा। लेकिन यह कागजों तक सीमित रह गया। मेडिकल कालेज के आंकड़े बताते हैं कि यहां भर्ती होने वाले कुल मरीजों में सिर्फ बीस फीसद ही ऐसे थे जो एक से दो दिन के भीतर मेडिकल कालेज पहुंचे। अस्सी फीसद बीमारी होने के सात दिन या इससे भी अधिक देर से पहुंचे। इनमें से भी करीब 93 फीसद बेहोशी की हालत में थे। ज्यादातर ऐसे थे जो गांवों में झोला छाप डाक्टरों या फिर निजी अस्पतालों में इलाज करा कर पहुंचे थे। इससे लाख कोशिशों के बावजूद मौतों की तादाद बढ़ी।

संसाधनों की कमी

पूर्वांचल में इंसेफ्लाइटिस के इलाज के सबसे बड़े केंद्र गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज में हालांकि इस साल बीस करोड़ की लागत से अत्याधुनिक वार्ड बनकर तैयार हुआ, लेकिन डाक्टरों, स्टाफ व संसाधनों की कमी से इलाज में दिक्कत हुई। जब बीमारी चरम पर थी तब यहां बाल रोग के चार वार्डों के सवा दो सौ बेड पर पांच सौ से अधिक मरीज भर्ती किए गए। आइसीय के 56 बेडों के साथ सामान्य बेडों को मिलाकर कम से कम सौ डाक्टर होने चाहिए थे पर यह संख्या आधे से भी कम रही। इनमें से भी ज्यादातर प्रशिक्षित नहीं थे। जिन नर्सों व कर्मचारियों की जरूरत मरीजों के इलाज के लिए थी उनकी तैनाती होते-होते नवंबर आ गया। साफ है मरीजों को जिस स्तर का इलाज चाहिए था नहीं मिल पाया।

स्वास्थ्य केंद्र बदहाल

जिन स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों के बेहतर इलाज की बात कही गयी वहां भी घोर लापरवाही बरती गई। यहां तक कि अधिकारियों की दौरे के समय भी कई अस्पतालों पर ताला लटका मिला। गोरखपुर-बस्ती मंडल के खासतौर पर इंसेफ्लाइटिस के इलाज के लिए सौ से अधिक इंसेफ्लाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर खोले गए थे वहां भी सुविधाओं की कमी रही।

बचाव में लापरवाही

महामारी से बचाव के लिए भी बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन न तो सही तरीके से फागिंग हुई न साफ-सफाई। सूअरबाड़े अब भी अपनी जगह कायम हैं। शुद्ध पेय जल के दावे भी खोखले रहे।

साल मौतें

2014 675

2013 497

2012 608

2011 655

2010 543

2009 568

2008 515

2007 547

2006 434