यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 26, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
बढ़ती मौतें, खतरे की घंटी
गोरखपुर:बीते चार दशक से पूर्वाचल के लिए रिसता नासूर बना इंसेफ्लाइटिस एक बार फिर से अपने खतरनाक रूप म

गोरखपुर:बीते चार दशक से पूर्वाचल के लिए रिसता नासूर बना इंसेफ्लाइटिस एक बार फिर से अपने खतरनाक रूप में है। बीते वर्षो की तुलना में इस बार मौतें अधिक हो रही हैं। जुलाई तक भर्ती मरीजों व मौतों के आंकड़े इसके गवाह हैं।
इस साल अबतक बीआरडी मेडिकल कालेज में 315 मरीज भर्ती हुए, जिनमें से 95 की मौत हुई है। मौतों का प्रतिशत 30 फीसद से अधिक है।
बीते दो वर्षो के आंकडे़ देखें तो साल 2016 में जुलाई महीने तक 372 मरीज बीआरडी में भर्ती हुए थे जिनमें से 96 की मौत हुई थी जो कि 25 फीसद है। 2015 में भी यही हाल था। तब जुलाई तक 340 मरीज मेडिकल कालेज में इलाज के लिए पहुंचे थे। इसमें ने 87 मौतें हुई थी जो 25 प्रतिशत है।
यह हाल तब है जब इस साल अबतक भर्ती हुए 315 मरीजों में से सिर्फ बारह में खतरनाक माने वाले जापानी इंसेफ्लाइटिस की पुष्टि हुई है। 26 मरीजों में स्क्रब टाइफस पाया गया है। इसमें से भी 17 मरीज जुलाई में भर्ती हुए हैं। 20 नमूनों की रिपोर्ट आनी बाकी है। लगभग पांच-पांच मरीजों में हर्पीज, मलेरिया व टीबी आदि को वजह बताया जा रहा है। इसके बावजूद मौतों की बढ़ती तादाद चौंकाने वाली है।
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तैयार हो रहा वार्ड
बीआरडी मेडिकल कालेज के इंसेफ्लाइटिस वार्ड के प्रभारी कफील खान के मुताबिक मरीजों की बढ़ती तादाद को देखते हुए तैयारी की जा रही है। सौ बेड के वार्ड में 54 आइसीयू बेड सहित कुल सौ बेड हैं। छह बेड की क्रिटिकल केयर यूनिट निर्माणाधीन है जो जल्द तैयार हो जाएगी। वार्ड संख्या बारह में 54 बेड हैं। वार्ड संख्या छह भी पूरी तरह तैयार है। यहां भी जरूरत पड़ने पर इंसेफ्लाइटिस के मरीजों को भर्ती किया जाएगा। सोमवार को आए प्रमुख सचिव को बताया गया था कि इंसेफ्लाइटिस के मरीजों की संख्या बढ़ने पर बाल रोग के दूसरे मरीजों व इंसेफ्लाइटिस पीड़ितों की तादाद बढ़कर चार सौ तक पहुंच जाती थी। उनसे 54 बेड के नए आइसीयू के निर्माण की मांग की गई थी।
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वायरस की पहचान जरूरी: डा. कुशवाहा
फोटो: डा. केपी कुशवाहा
चार दशक तक बीआरडी मेडिकल कालेज में इंसेफ्लाइटिस के इलाज से जुडे़ पूर्व प्राचार्य व बाल रोग के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. केपी कुशवाहा का कहना है कि इतनी बड़ी तादाद में मौतों की वजह का पता लगाने के लिए वायरसों की पहचान होना जरूरी है। जहां तक स्क्रब टायफस की बात है तो इससे पीड़ित बुखार के कुल मरीजों में से चार फीसद में ही ब्रेन, हृदय व गुर्दा प्रभावित होता है। इस तरह के मरीजों में से भी सिर्फ 25 फीसद की ही मौत होती है। इस तरह देखा जाए तो स्क्रब टाइफस के कुल मरीजों में से तीन फीसद तक की ही मौत होती है। लेकिन स्क्रब टायफस का पता लगाने के लिए जांच की सही व्यवस्था होनी चाहिए।
