यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 05, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
इंसेफ्लाइटिस वार्ड से दूसरे मरीजों को हटाने पर विवाद
गोरखपुर इंसेफ्लाइटिस वार्ड व आइसीयू से दूसरी बीमारियों के गंभीर मरीजों को हटाने को लेकर अधिकारियो

गोरखपुर
इंसेफ्लाइटिस वार्ड व आइसीयू से दूसरी बीमारियों के गंभीर मरीजों को हटाने को लेकर अधिकारियों के बीच विवाद बढ़ गया है। मेडिकल कालेज के डाक्टरों ने सीएमओ के इस कदम को अमानवीय बताया है। बाल रोग की विभागाध्यक्ष ने प्राचार्य को पूरे प्रकरण से पत्र के जरिए अवगत कराते हुए मार्गदर्शन मांगा है।
डाक्टरों का कहना है कि वर्तमान समय बाल रोग के वार्डो में कुल मिलाकर 228 बेड हैं, जबकि रोजाना इंसेफ्लाइटिस सहित दूसरे मरीजों की संख्या साढ़े तीन सौ से लेकर चार सौ के बीच रहती है। बाल रोग विभाग के न्यू इंसेफ्लाइटिस वार्ड में एक जगह 50 बेड का पीडियाट्रिक आइसीयू संचालित है। संसाधनों की कमी से वर्तमान में इंसेफ्लाइटिस व दूसरी बीमारियों के गंभीर मरीजों के लिए अलग-अलग पीडियाट्रिक आइसीयू नहीं चलाया जा सकता। इसलिए दूसरे मरीजों को भी इंसेफ्लाइटिस वार्ड में रखा जाता है। यदि वार्ड सौ में आइसीयू होते हुए दूसरी बीमारियों के गंभीर मरीजों को यह सुविधा न दी जाए तो न केवल अमानवीय बल्कि मेडिकल प्रोफेसनल के इथिक व दायित्वों के विरुद्ध होगा।
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एईएस नंबर देने पर भी सवाल
बाल रोग की विभागाध्यक्ष के मुताबिक सीएमओ ने बैठक में कहा गया कि यदि पहले के वर्षो में मेडिकल कालेज में भर्ती इंसेफ्लाइटिस का मरीज 2016 में भी अन्य बीमारियों के साथ वार्ड में भर्ती होता है तो उसे नया एईएस नंबर न दिया जाए। यदि उसकी मौत हो जाती है कि उसकी मौत के कारण में एईएस ना लिखा जाए क्यों कि इससे सरकार को उसे आर्थिक मदद देनी पड़ेगी। इस पर सीएमओ को बताया गया कि ऐसे मरीजों का विवरण फालोअप एईएस केस अंतर्गत दर्ज किया जाता है और मौत होने पर फालोअप एईएस लिखते हुए बीमारी के विवरण के साथ मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी किया जाता है।
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स्वास्थ्य विभाग पर लापरवाही का आरोप
मेडिकल कालेज के डाक्टरों ने स्वास्थ्य विभाग पर इंसेफ्लाइटिस के मरीजों के इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा है कि इंसेफ्लाइटिस के 80 से 85 फीसद मरीज सीधे मेडिकल कालेज आ रहे हैं। यह मरीज किसी स्वास्थ्य केंद्र पर इलाज कराए बिना ही बीमारी के जटिल होने के बाद मेडिकल कालेज आते हैं। अमूमन इन मरीजों में जटिलता होने के पहले पांच से सात दिन का बुखार होता है। स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चलाए जा रहे फीवर ट्रैकिंग प्रोग्राम को मजबूत किया जाए जिससे जटिलता होने के पहले रोगी का इलाज किया जा सके।
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इसलिए शुरू हुआ विवाद
केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री के मेडिकल कालेज दौरे के पहले सीएमओ डा. रवींद्र कुमार ने इंसेफ्लाइटिस वार्ड का निरीक्षण किया था। बाद में नेहरू अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक को भेजे गए पत्र में कहा कि सौ बेड के इंसेफ्लाइटिस वार्ड में एक ही बेड पर इंसेफ्लाइटिस व अन्य संक्रामक रोगियों को रखा जा रहा है, जिससे आपस में संक्रमण फैलने की प्रबल संभावना है। सौ बेड वार्ड में सिर्फ इंसेफ्लाइटिस मरीजों को भर्ती किया जाए।
इंसेफ्लाइटिस के मरीजों को मेडिकल कालेज में दवाएं नहीं देने पर भी सीएमओ ने आपत्ति करते हुए कहा था कि मरीजों को बाहर से दवा खरीदने के लिए विवश न किया जाए। ------------
बाल रोग की विभागाध्यक्ष का पत्र नहीं मिला है। पत्र मिलने के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
डा. राजीव मिश्र, प्राचार्य
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