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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 17, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

वैज्ञानिकों ने शुरू की वायरस की तलाश

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Published: Wed, 17 Sep 2014 02:01 AM (IST)

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जागरण संवाददाता, गोरखपुर

पूर्वाचल में वर्षो से तबाही की वजह बने इंसेफ्लाइटिस के अनजाने वायरस की तलाश के लिए सीडीसी (सेंटर फार डिजीज कंट्रोल) अमेरिका के विशेषज्ञों की टीम ने मंगलवार से अपनी मुहिम शुरू कर दी। पहले दिन विशेषज्ञ महानगर स्थित चरगावां स्वास्थ्य केंद्र और इसके बाद बीआरडी मेडिकल कालेज पहुंचे। यहां मरीजों के चिकित्सा संबंधी रिकार्ड देखे, मरीजों की जांच की तथा इलाज करते चिकित्सकों से जानकारी ली।

मंगलवार को सबसे पहले टीम चरगांवा स्वास्थ्य केंद्र पहुंची। यहां मौके पर तो कोई मरीज भर्ती नहीं मिला लेकिन टीम ने यहां जुलाई से लेकर अब तक भर्ती हो चुके 28 मरीजों की केस शीट की पड़ताल की। चिकित्सकों से पूछा कि मरीज किस स्थिति में आए थे, तब क्या लक्षण थे, क्या इलाज हुआ, कितने ठीक हुए या रेफर किए गए। इस बिंदु पर भी बात हुई है क्यों ज्यादातर मरीज सीधे मेडिकल कालेज पहुंच रहे हैं। यहां के बाद टीम मेडिकल कालेज पहुंची। यहां प्राचार्य डा. केपी कुशवाहा के साथ भर्ती होने वाले मरीजों की स्थिति की जानकारी लेने के बाद इंसेफ्लाइटिस वार्ड में गए।

वार्ड से करीब दस बजे पहुंची टीम देर शाम तक रही। इस दौरान विशेषज्ञ एक-एक मरीज के पास गए। उन्होंने मरीजों का बेड हेड टिकट का अध्ययन किया। उसमें लिखे विवरण तथा चल रही दवाओं की जानकारी ली। टीम ने जितने मरीजों को देखा, सबका नाम, पता, बीमारी के लक्षण व विवरण का रिकार्ड अपने पास आगे की जांच के लिए सुरक्षित रख लिया।

टीम में सीडीसी अटलांटा अमेरिका के डा. जेम्स सेवार, डा. पद्मिनी, डा. मयंक द्विवेदी के साथ बैंगलोर के डा. रवि यादव व यू. रवि शामिल थे। वैज्ञानिकों के साथ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के महाप्रबंधक डा. अनिल मिश्रा, बीआरडी मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. केपी कुशवाहा, राज्य कार्यक्रम अधिकारी इंसेफ्लाइटिस डा. एमके गुप्ता, जिला मलेरिया अधिकारी डा. एके पांडेय ,डा. महिमा मित्तल, के साथ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी उपस्थित थे।

मुसीबत बने हैं अनजाने वायरस

पूर्वाचल में पिछले साढ़े तीन दशक से अधिक समय से तबाही मचा रहे जापानी इंसेफ्लाइटिस के साथ साल 2003 में जलजनित बीमारी का कहर शुरू हो गया। शुरू में चिकित्सक समझ नहीं पाए लेकिन जब लक्षणों में परिवर्तन का सिलसिला जारी रहा तो यहां से नमूनों की जांच बाहर भेजी गई। तब पहली बार पता चला कि जापानी इंसेफ्लाइटिस के साथ ही इंटेरोवायरस भी बीमारी की वजह बन रहा है। बाद में पाया गया कि जापानी इंसेफ्लाइटिस के मरीज की तादाद कम हुई है। बाकी बचे मरीजों में इंटेरोवायरस के अलावा बड़ी तादाद में ऐसे मरीज हैं जिनमें बीमारी के जिम्मेदार वायरस की पहचान नहीं हो पा रही।

टीम के साथ आए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के महाप्रबंधक डा. अनिल मिश्र के मुताबिक विशेषज्ञों के आने का मकसद बीमारी की वजह बने इन अनजाने वायरसों की पहचान करना है। यह भी देखा जा रहा है कि वह कौन सी वजहें है जिससे भारी तादाद में मौतें हो रही हैं। राज्य सरकार पूरे मामले को लेकर अत्यंत गंभीर है।