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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 12, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

आइसीयू के नाम पर तीन साल से छल

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Published: Thu, 12 Dec 2013 08:42 PM (GMT+05:30)Updated: Thu, 12 Dec 2013 08:43 PM (GMT+05:30)

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गोरखपुर : इंसेफेलाइटिस का सर्वाधिक कहर झेल रहे गोरखपुर के जिला अस्पताल की आइसीयू के बारे में चौंकाने वाला सच सामने आया है। तीन साल पहले स्थापित इस आइसीयू में गंभीर मरीजों के साथ इलाज के नाम पर छल होता रहा। जरूरी उपकरणों की कमी से यहां लगे वेंटीलेटर कभी चले ही नहीं। मामला तब खुला जब यहां नए वेंटीलेटर स्थापित करने के लिए काम शुरू हुआ।

जब भी मंत्रियों, अधिकारियों के दौरे होते यहां इंसेफेलाइटिस व अन्य मरीजों की भर्ती कर दी जाती। बाहर से यही दिखावा किया जाता रहा जैसे आइसीयू पूरी तरह संचालित है। आइसीयू कक्ष को साफ-सुथरा कर दिया जाता। हद तो यह है कि इस दौरान यहां तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती, यूपी के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्र, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद, यूपी के स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन, राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के अधिकारियों, प्रमुख सचिव व डीजी तक के दौरे हुए। हाल के महीनों में प्रमुख सचिव बीएम मीना भी आइसीयू में गए, पर सच को भांप न सके। पूरे समय दिखावा करके अधिकारियों की आंख में धूल झोंका गया। यदि इस मामले की जांच हुई तो कई जिम्मेदार नपेंगे।

जिला अस्पताल में बारह बेड की आइसीयू की स्थापना का निर्णय तीन साल पहले लिया गया। इसके पीछे मंशा थी कि गोरखपुर मेडिकल कालेज पर इंसेफेलाइटिस व दूसरे गंभीर मरीजों का भार कम किया जाए। इसी के तहत यहां साल 2010 में नई दिल्ली में हुए कामन वेल्थ खेलों में प्रयोग किए गए बारह वेंटीलेटर मंगा लिए गए। जिला अस्पताल में निर्मित न्यू बिल्डिंग में बारह बेडों का आइसीयू वार्ड तैयार हो गया। बकायदा वेंटीलेटर स्थापित भी कर दिए गए। आक्सीजन पाइप लाइन का काम भी कर लिया गया, लेकिन वेंटीलेटर को चलाने के लिए जरूरी कार्डियक मानीटर, इंफ्यूजन पंप, एबीजी (आर्टीरियल ब्लड गैस) की जांच की व्यवस्था नहीं की गई। नतीजा हुआ कि स्थापित वेंटीलेटर कभी चले ही नहीं।

उधर दिसंबर 2010 में आइसीयू के प्रभारी के नाम पर गोरखपुर जिला अस्पताल आए डा. एपी सिंह से इस पद का काम न लेते हुए उन्हें इमरजेंसी मेडिकल अफसर की जिम्मेदारी सौंप दी गई। गंभीर बात यह है कि आइसीयू ठप रहने की बात को अफसरों ने छिपाए रखा। पूरे तीन साल से मुख्यमंत्री, मंत्री और अफसर तक इसी गलतफहमी में रहे कि आइसीयू चल रहा है।

बहरहाल इस खेल में सबसे अधिक नुकसान मरीजों का हुआ। गोरखपुर मेडिकल कालेज के बाद एक मात्र आइसीयू होने के चलते यहां दूर दराज से इंसेफेलाइटिस व अन्य बीमारियों के गंभीर मरीज आते रहे। चूंकि यहां आइसीयू संचालित थी ही नहीं, लिहाजा गंभीर मरीजों को डाक्टर यहां से रेफर करते रहे। जिला अस्पताल आने व यहां से बीआरडी मेडिकल कालेज रेफर होकर जाने में हुई देर में कितने गंभीर मरीजों ने दम तोड़ दिया, यह कहना मुश्किल है।

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जहां तक तीन साल से वेंटीलेटर न चलने का सवाल है तो यह मामला मेरे कार्यकाल का नहीं है। अब बारह नये वेंटीलेटर आ चुके हैं, इनको चलाने के लिए जरूरी सामानों के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।

डा. सुधाकर मिश्रा, प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक

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