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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 10, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

इंसेफेलाइटिस मरीजों की डाइग्नोसिस पर विवाद

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Published: Tue, 10 Dec 2013 09:42 PM (GMT+05:30)Updated: Tue, 10 Dec 2013 09:43 PM (GMT+05:30)

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जागरण संवाददाता, गोरखपुर :

पूर्वाचल में इंसेफेलाइटिस के इलाज के सबसे बड़े केंद्र बीआरडी मेडिकल कालेज में मरीजों की डाइग्नोसिस को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। अपर निदेशक स्वास्थ्य द्वारा भेजी गई मरीजों की केस हिस्ट्री के अध्ययन के बाद महानिदेशालय ने टायफायड, मीजिल्स, डेंगू, लीवर व किडनी के कई मरीजों को भी इंसेफेलाइटिस का मरीज बताए जाने की बात कही है। महानिदेशक की तरफ से यह रिपोर्ट प्रमुख सचिव स्वास्थ्य को भेज दी गई है। इसको लेकर अफसरों में हड़कंप है।

प्रमुख सचिव को भेजी गई रिपोर्ट में मेडिकल कालेज में पिछले 31 अक्टूबर को इंसेफेलाइटिस के चौदह मृतकों तथा इनके अलावा मरने वाले 37 मरीजों की बीएचटी (बेड हेड टिकट) का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीआरडी मेडिकल कालेज स्थित नेहरू अस्पताल द्वारा उपलब्ध कराई गई बीएचटी के परीक्षण के बाद चौदह मृतकों में से दो मीजिल्स, दो में टायफायड, एक में डेंगू से संबंधित इंसेफ्लोपैथी, तीन रोगी लीवर डिस्फंक्शन के प्रतीत होते हैं। सिर्फ एक रोगी एइएस (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) की श्रेणी में पाया गया है जबकि पांच की जांच प्रतीक्षित है। नेहरू अस्पताल में भर्ती तीन रोगियों की भर्ती अवधि दो से तीन सप्ताह तथा अन्य की भर्ती अवधि दो से पांच दिन की रही है पर किसी भी रोगी की बीएचटी में नेशनल इंस्टीच्यूट आफ वायरोलॉजी पुणे से परीक्षित कराए गए रोगियों के जांच नमूनों के परिणाम अंकित नहीं हैं।

उधर इसके पहले मरने वाले 37 अन्य लोगों की केस शीट का विश्लेषण बाद जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रयोगशाला जांच परिणामों के आधार पर इनमें से आठ मरीजों में लीवर डिस्फंक्शन, तीन में लीवर व किडनी डिस्फंक्शन तथा दो मरीजों में किडनी डिस्फंक्शन प्रदर्शित हुआ है। यही नहीं बल्कि रोगी सचिन की केस शीट में ट्यूबरकुलर मेनेंजाइटिस, रिया नामक मरीज की केस शीट पर एक्यूट बैक्टीरियल मेनेंजाइटिस, मरीज शाहनवाज की केस शीट पर मीजिल्स तथा रोगी क्रांतिवीर की केस शीट पर मेनेंजाइटिस अंकित भी किया गया है। इन 37 मृतकों में से बीस में मायोकार्डाइटिस (हृदय में सूजन)तथा पांच में एस्पिरेशन न्यूमोनिया उत्पन्न होना भी पाया गया है। किसी भी मरीज की केस शीट में नेशनल इंस्टीच्यूट आफ वायरोलॉजी पुणे या बीआरडी मेडिकल कालेज द्वारा किए गए वायरल जांचों की रिपोर्ट अंकित नहीं है।

रिपोर्ट में यह बात साफ तौर पर कहने की कोशिश की गई है कि मेडिकल कालेज में आने वाले अन्य मरीजों को भी इंसेफेलाइटिस का मरीज बता कर भर्ती किए गया है। ----------------

आरोप बेबुनियाद : डा. कुशवाहा

उधर मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. केपी कुशवाहा ने इस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है जिन लोगों को इंसेफेलाइटिस की रोकथाम की जिम्मेदारी दी गई है वह इसमें नाकाम होने के बाद ऐसे आरोप लगा रहे हैं। जवाबदेही कम करने के लिए वे चाहते हैं कि मरीजों की संख्या कम रहे। दूसरी बीमारियों के रोगियों को इंसेफेलाइटिस का बताए जाने पर उन्होंने कहा कि इंसेफेलाइटिस के साथ ही दूसरी बीमारियां भी हो सकती हैं। इसका मतलब नहीं कि मरीज को इंसेफेलाइटिस नहीं है। जहां तक इंसेफेलाइटिस के मरीजों की डाइग्नोसिस का सवाल है तो बीआरडी मेडिकल कालेज में विशेषज्ञ चिकित्सक मरीजों का इलाज कर रहे हैं, जिनको इसका लंबा अनुभव है। इलाज करने वाला चिकित्सक ही बेहतर बता सकता है।

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