यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 06, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
इलाज में देरी दे रही मौत को दावत

हेमन्त पाठक , गोरखपुर :
सरदार नगर के लक्ष्मणपुर मल्लाह टोला निवासी एक साल के अमन इस साल 11 अगस्त को इंसेफेलाइटिस से पीड़ित हुए। दस दिन तक नई बाजार व चौरीचौरा में झोला छाप चिकित्सकों से इलाज कराते रहे। जब बीमारी बिगड़ गई तो 22 अगस्त को बीआरडी मेडिकल कालेज में भर्ती हुए। आठ दिनों तक इलाज चला पर लाख कोशिश के बावजूद डाक्टर बचा नहीं पाए और अमन ने 29 अगस्त को दम तोड़ दिया।
इसी तरह रामजानकी नगर कौशलपुर, नकहा चरगावां की अठारह वर्षीय काजल को इस साल 28 जुलाई को बुखार हुआ। तेज बुखार के साथ झटके आने पर भी चार दिनों तक झाड़-फूंक के साथ झोला छाप से इलाज कराया। गंभीर स्थिति में एक अगस्त को मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया, जहां तीन अगस्त को मौत हो गई। इसी से मिलती जुलती कहानी इंसेफेलाइटिस से मृतक राजघाट गोरखपुर निवासी तेरह साल के महेश, सिंघड़िया निवासी चार साल के श्लोक चौधरी की है।
यह सभी बातें स्वास्थ्य विभाग द्वारा इंसेफेलाइटिस से मरे मरीजों की मौतों की आडिट में सामने आई हैं जिससे साबित होता है कि इलाज में देरी इंसेफेलाइटिस से मौतें बढ़ने की मुख्य वजह है।
ऐसा गिने-चुने नहीं बल्कि बीआरडी मेडिकल कालेज में इलाज के लिए पहुंचे करीब सत्तर फीसद मरीजों के साथ है। यह लोग बीमारी बिगड़ने के बाद पहुंचे और लाख कोशिश के बाद भी डाक्टर उनको बचा नहीं पाए।
डेथ आडिट मृतकों के घर जाकर की गई। यहां स्वास्थ्य विभाग की टीम ने मृतक के परिजनों से कई महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल की मसलन बच्चा कब बीमार हुआ, क्या लक्षण थे, शुरुआत में कहां इलाज कराया। जिन डाक्टरों से इलाज हुआ टीम ने उनके पास जाकर भी सवाल किया। निष्कर्ष यही निकाला गया कि इलाज में देरी से बीमारी बिगड़ी जो मौत की वजह बनी। यदि समय से इलाज होता तो मौतों की तादाद में भारी कमी आ सकती थी।
उधर मेडिकल कालेज के स्तर से कराए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बीस फीसद मरीज तो ऐसे थे जो बेहद गंभीर स्थिति में मेडिकल कालेज पहुंचे और आठ घंटे के भीतर दम तोड़ दिए। चालीस फीसद की मौत पांच दिन के अंदर हुई जबकि बीस फीसद की मौत पांच से पंद्रह दिन के अंदर हो गई। सिर्फ बीस फीसद मरीज ही ऐसे थे जिनकी मौत पंद्रह दिन तक भर्ती रहने के बाद हुई।
इन अध्ययन से भी यह साफ है मरने वाले ज्यादातर मरीज ऐसे समय में पहुंचे जब बीमारी पूरी तरह अपना असर दिखा चुकी थी।
वे जो ठीक हुए
जो बीमारी होते ही तत्काल इलाज के लिए पहुंच गए उनमें से अधिकतर पूरी तरह ठीक हो अपने घरों को लौटे। आडिट में यह बात सामने आई है। करमौरा भटहट निवासी चौदह वर्षीय ममता नौ अक्टूबर को बीमारी हुई। दस को मेडिकल कालेज में भर्ती हुई। अठारह अक्टूबर को ठीक होकर डिस्चार्ज हुई। इसी तरह लेहनी टोला डुमरी नं-दो निवासी तीन साल खुशी 19 अक्टूबर को बीमार हुई। इसी दिन गोरखपुर जिला अस्पताल में भर्ती हुई। 29 अक्टूबर को पूरी तरह ठीक हो कर लौटी।
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सर्वे में यह बात सामने आई है कि शासकीय अस्पताल पहुंचने में जितना विलंब होता है, मौत की संभावना उतनी बढ़ जाती है। बीमारी का लक्षण दिखते ही बिना समय गंवाए शासकीय अस्पताल पहुंचें।
जेपी गुप्ता, मंडलायुक्त
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बुखार होने के साथ बच्चा यदि सुस्त रहने लगे, खेल-कूद बंद कर दे तो उससे तत्काल चिकित्सक को दिखाना चाहिए। मेडिकल कालेज में सत्तर फीसद मरीज गंभीर अवस्था में इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
डा. केपी कुशवाहा, प्राचार्य, बीआरडी मेडिकल कालेज
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