यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 24, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
इन्हें पता ही नहीं कैसे हो रहीं मौतें

जागरण संवाददाता, गोरखपुर
एक बार फिर जलजनित इंसेफेलाइटिस ने पूर्वाचल में तबाही मचा रखी है। इस बार मेडिकल कालेज व दूसरे अस्पताल में भर्ती हुए 322 मरीजों में करीब-करीब सभी इसी तरह के इंसेफेलाइटिस के शिकार हैं। इसके बावजूद ज्यादातर मामलों में अब तक यह पता नहीं लग पाया है कि कौन सा विषाणु या जीवाणु बीमारी के लिए जिम्मेदार है।
पूर्वाचल के मासूमों के लिए काल बना जलजनित इंसेफेलाइटिस एक बार फिर अपने भयावह रूप में है। अब तक मेडिकल कालेज व जिला अस्पतालों में भर्ती 322 से अधिक मरीजों में से 217 की जांच रिपोर्ट आई है। इन सभी मरीजों को जेई निगेटिव बताया गया है। साफ यह जापानी इंसेफेलाइटिस के मरीज नहीं है, मतलब जलजनित इंसेफेलाइटिस के चलते बीमार हुए हैं। लेकिन रिपोर्ट में यह साफ नहीं किया गया है कि जो मरीज जेई निगेटिव हैं और कौन से विषाणु के चलते बीमार हुए हैं।
इधर उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो जांच में सिर्फ एक मरीज में जापानी इंसेफेलाइटिस जबकि बारह फीसद में जलजनित इंटेरोवायरस की पुष्टि की गई है। हालांकि इस रिपोर्ट को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन इस हिसाब से भी 88 फीसद वायरस अनजाने हैं। यूं कहें कि ज्यादातर मरीजों की मौत के लिए कौन सा वायरस जिम्मेदार हैं यह कोई भी बताने की स्थिति में नहीं है।
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2003 में पहली बार हुई पहचान
जापानी इन्सेफेलाइटिस से अलग इस बीमारी को चिकित्सकों ने पहली बार वर्ष 2003 में लक्षणों के आधार पर पहचाना। वर्ष 2004 में भी पूर्वाचल के विभिन्न हिस्सों से गोरखपुर मेडिकल कालेज में भर्ती हुए इन्सेफेलाइटिस के कई मरीजों में जब फिर अलग लक्षण दिया तो चिकित्सकों की परेशानी बढ़ गई। इसी साल मेडिकल कालेज के चिकित्सकों ने अपने स्तर से जांच के लिये 25 सेम्पुल दिल्ली भेजा जिनमें से 17 में इन्टरोवायरस की पुष्टि की गयी। वर्ष 2003 व 2004 में इन्टरोवायरस से पीड़ित मरीजों की तादाद काफी कम थी। 2005 में बीमारी से पीड़ित मरीजों की संख्या में इजाफा हो गया। इस साल भर्ती हुए कुल 4720 मरीजों में से करीब बीस प्रतिशत इससे पीड़ित पाए गए। वर्ष 2006 में भर्ती हुए कुल 1950 में से लक्षण के आधार पर पैंसठ प्रतिशत मरीज चिन्हित किए गए। 2007 में कुल भर्ती 2790 में से पचास फीसदी से अधिक इससे ग्रसित मिले। 2008 में में पूर्वाचल के दौरे पर आई अमरीका व भारत सरकार की टीमों के विशेषज्ञों ने इस बात की पुष्टि की। अब हालात यह है कि इंसेफेलाइटिस के कुल मरीजों में इनकी तादाद नब्बे फीसद से अधिक हो गई है, लेकिन गंभीर यह है कि बीमारी फैलाने वाले यह कौन से विषाणु या जीवाणु हैं इसका पता नहीं चल पाया है।
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