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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 22, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

शहीदों की धरती सैदपुर है सूरमाओं का तीर्थ

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Published: Tue, 22 Jan 2013 10:07 PM (IST)

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बीबीनगर,(बुलंदशहर) : शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा। इस शेर से राम प्रसाद बिस्मिल ने वतन पर जान तक कुर्बान करने का जो जज्बा भरा था, वह सैदपुर गांव पर बिल्कुल सटीक बैठता है। यहां शहीदों की मजारों पर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक पहुंचते रहे हैं, और यह शूरमाओं का तीर्थ है।

जिला मुख्यालय से करीब चालीस किमी दूर बसे गाव सैदपुर में शौर्य, साहस और मातृभूमि के लिए जान तक न्यौछावर करने की परंपरा पुरानी है। यही वजह है कि यहां हर परिवार फौजी का परिवार है। एक दूसरे-तीसरे घर में शहीदों के अदम्य साहस की महागाथा है। अंग्रेजी हुकूमत काल की हो या आजादी पश्चात यहा के जवानों ने शौर्य, वीरता एवं शहादत की अद्वितीय इबारत लिखी है। आधुनिक काल की बात करें तो पराक्रम का सिलसिला विश्वयुद्ध वर्ष 1914 से शुरू होता है। इसमें अकेले इस गाव से 155 सैनिक जर्मनी गए थे, जिनमें से 29 शहीद हो गए और 100 जवान वहीं बस गए। जहां निवास किया उसका नाम जाटलैंड रखा। 1962 के भारत-चीन युद्ध हो या फिर 1965 और 1971 में पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने का वक्त, सैदपुर ने हर लड़ाई में आहुति दी है। यह गाव 171 शहीदों की लम्बी फेहरिस्त का गवाह है। 1971 के युद्ध में विजय सिरोही व मोहन सिरोही एक ही दिन शहीद हुए थे।

1965 की लड़ाई में सैदपुर के सुखबीर सिंह सिरोही को परमवीर चक्र मिला था। इसके अलावा सैदपुर की आंचल में शौर्य एवं साहस के लिए देश-प्रदेश से मिले दर्जनों मेडल है।

केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री रहते इदिरा गाधी भारत पाक युद्ध में शहादत देने वाले लेफ्टिनेंट सुखबीर सिंह सिरोही का अस्थि कलश लेकर स्वयं पहुंची थीं। सैदपुर गाव के बीचों बीच शहीद स्तंभ यहा की गौरव गाथा का बखान करता है। शहीद स्तंभ पर पूर्व प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गाधी व चौधरी चरण सिंह आ चुके है। इसके अलावा मुख्यमंत्री रहते हुए बाबू बनारसी दास, रक्षा मंत्री रहते मुलायम सिंह यादव, राजा बच्चू सिंह और चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत यहा आ चुके हैं। शहीद और सेवानिवृत्त मिलाकर सैदपुर में फौजियों की करीब 300 विधवाएं है। पतियों ने अगर सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए प्राण न्यौछावर किए तो पत्‍ि‌नया भी उनके बलिदान में सहभागी बनीं।

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