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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 29, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

मुफलिसी..बेकारी और..तीन मौतें

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Published: Tue, 29 Oct 2013 01:08 AM (GMT+05:30)Updated: Tue, 29 Oct 2013 01:09 AM (GMT+05:30)

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जागरण संवाददाता, बरेली : गरीबी और कर्ज जिस आंगन का रास्ता देख लें तो वहां 'मौत' खुद ही रास्ता बना लेती है। गुप्ता परिवार के यहां भी यहीं सब कुछ हुआ। मुफलिसी ऊपर से सिर पर कर्जे का बोझ लिए हर दिन तिल-तिल कर मर रहे गुप्ता परिवार के तीनों सदस्यों ने ऐसी जिंदगी से मौत को अच्छा माना और तीनों ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

मुफलिसी में मौत को गले लगाने वाले अनिल गुप्ता का घराना कभी इसी शहर में काफी मशहूर था। शहर के बड़े बाजार में सौ साल पुरानी उनकी घासीराम राजाराम बर्तन वालों की प्रतिष्ठित दुकान हुआ करती थी। करीब 15 साल पहले राकेश गुप्ता ने इस दुकान को बेच दिया। इसके बाद वह नीम की चढ़ाई पर स्थित अपने पैतृक मकान में रहने लगे। जब गरीबी ने घर का रास्ता देखा तब मकान भी बेच दिया। इसके बाद नीम की चढ़ाई पर एक मकान में कुछ दिन तक किराये पर रहे। पिछले करीब चार साल से वह मिर्धान वाली गली में अपने मौसेरे बहनोई आर्दश गुप्ता के मकान में रह रहे थे। आर्दश गुप्ता के बेटा विजय व पुत्रवधू उपमा गुप्ता डॉक्टर हैं। आर्दश अपनी बेटे बहू के साथ जनकपुरी में रहते हैं।

चर्चा है कि नौकरी की तलाश के दौरान अखिल कर्जदार हो गया था। कितना कर्जा था, यह अभी साफ नहीं हो सका है। रिश्तेदारों ने दबी जुबान यह सच स्वीकार किया है। इसी को लेकर पूरा परिवार परेशान था। आशंका तो यह है कि कर्जदार कर्जा वसूली के लिए परिवार को परेशान कर रहे होंगे। गरीबी, कर्जा और कर्जदारों से तंग आकर पूरे परिवार ने मौत को गले लगाना ही उचित समझा।

पढ़ने में होनहार था अखिल

ऐसा नहीं है कि अखिल पढ़ने में कमजोर था। किस्मत का ही खेल था कि उसे अच्छी नौकरी नहीं मिल रही थी। उसने कई बार सरकारी नौकरी के लिए भी प्रयास किए थे लेकिन नतीजा सिफर रहा था। जिसके बाद उसने खुद नौकरी कर अपनी पढ़ाई का खर्चा निकालने की जिद्दोजहद शुरू की। हालांकि, वह यहां भी नाकाम रहा। इस समय अखिल तीन चार प्राइवेट कंपनियों में पार्ट टाइम अकाउंटेट की नौकरी कर रहा था। साथ ही सीए की तैयारी भी कर रहा था।

दवाई तक के लिए करना पड़ता था संघर्ष

गुप्ता परिवार में गरीबी का आलम यह था कि पिछले कुछ समय से राकेश का उपचार नहीं हो पा रहा था। कभी रिश्तेदार तो कभी दोस्त दवाइयां लाकर दे देते थे। पिता के स्वास्थ को लेकर भी अखिल काफी चिंतित रहता था।

नहीं हो सका था रिश्ता

रिश्तेदारों की माने तो तीन से चार महीने पहले अखिल के लिए एक रिश्ता आया था। परिवार में खुशियां तो बिखरी थीं लेकिन कहीं न कहीं गरीबी आड़े आ गई। अखिल के पास बेहतर नौकरी न होने के कारण रिश्ता नहीं हो सका था।

खाली डिब्बे बयां कर रहे थे सच्चाई

जिस स्थान पर राकेश और रत्नेश का शव फंदे पर लटका हुआ था, ठीक वहीं पर एक अलमारी रखी हुई थी, जो खुली थी। उसमें रखे खाली डिब्बे इस परिवार की गरीबी को बयां करने के लिए काफी थे। मकान मालिक आदर्श कुमार गुप्ता ने बताया कि बीती शुक्रवार सुबह वह अपनी पत्नी स्नेहलता के साथ राकेश से मिलने आए थे लेकिन घर के मुख्य द्वार पर ताला लटका होने के कारण वे लोग बैरंग लौट गए थे।

शनिवार शाम तक देखा गया अखिल

मुहल्ले वालों की अगर मानें तो उन्होंने अखिल को शनिवार शाम तक देखा था। वह एक दुकान पर सामान लेने गया था। इससे संभावना है कि उसने व उसके माता-पिता ने फांसी शनिवार रात ही लगाई हो।

अखिल के पैरों में चप्पल कैसे रह गई

एक सबसे बड़ा सवाल पुलिस के सामने यही उठ रहा है कि आखिर फांसी लगाने वाले अखिल के पैरों में चप्पल कैसे रह गई। जबकि उसके माता-पिता के पैरों में तो चप्पल नहीं थी।

मां की साड़ी बनी गले का फंदा

मां और बेटे का शव साड़ी के सहारे फंदे से लटके हुए थे, जबकि पिता का शव चुन्नी के सहारे लटका हुआ था। इससे साफ है कि आत्महत्या सुनियोजित तरीके से की गई। रिश्तेदारों का कहना है कि राकेश के परिवार की माली हालत बेहद ही दयनीय थी। आलम यह था कि कभी-कभी अखिल के पास फोन रिचार्ज कराने तक के रुपये नहीं होते थे। जब से उसकी नौकरी छूटी, तब से घर में कोई फोन था ही नहीं।

परिवार रहता था बेहद रिजर्व

मुहल्लेवालों की मानें तो गुप्ता परिवार बेहद रिजर्व रहता था। उनका किसी के घर ज्यादा आना-जाना नहीं था। ज्यादातर वक्त यह परिवार घर के अंदर ही रहता था। हां अखिल जरूर मुहल्ले के लोगों से बोल देता था।

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दिवाली की खुशियों पर मातम की छाया

इस समय मिर्धान गली में दिवाली

की जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं। अधिकांश घरों में रंग रोगन का काम चल रहा है। कई घरों में लटकती रंग बिरंगी झालरें दिवाली का इस्तकबाल करने के लिए तैयार हैं। सोमवार सुबह एक पल में ही पूरे मुहल्ले का माहौल बदल गया। तीन लोगों द्वारा आत्महत्या की खबर फैलते ही पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। हर घर में सन्नाटा पसर गया और सैकड़ों लोग घटनास्थल पर जा पहुंचे। मुहल्लेवालों का कहना है कि उम्मीद नहीं थी कि गुप्ता परिवार इतनी गरीबी में जीवन यापन कर रहा है। अगर पता होता तो शायद कुछ मदद कर दी जाती। फिलहाल इस घटना के बाद से मिर्धान गली की दिवाली बेरंग हो गई है।

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