यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 01, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
क्या लिव-इन शादी का विकल्प हो सकता है?
सामाजिक बदलाव के इस दौर में युवा पीढ़ी लिव-इन रिलेशनशिप को सहजता से स्वीकारने लगी है, लेकिन क्या यह व्यवस्था ...और पढ़ें

स्त्री विरोधी है यह चलन
सरस्वती अग्रवाल, रायपुर
मेरे विचार से विवाह के बगैर स्त्री-पुरुष का साथ रहना हमारी संस्कृति और नैतिकता के खिलाफ है। सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए सदियों पहले विवाह की व्यवस्था बनाई गई होगी। किसी सभ्य समाज के लिए विवाह संस्था का कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता। लिव-इन की हिमायत करने वाले लोग यह तर्क देते हैं कि इसके माध्यम से युवा जोडों को एक-दूसरे को जानने-समझने का अवसर मिलता है, लेकिन यह तर्क निराधार है। शादी से पहले एक-दूसरे को जानने के लिए साथ रहना जरूरी नहीं है। बिना साथ रहे भी आपसी बातचीत के जरिये एक-दूसरे को अच्छी तरह जान सकते हैं। कुछ लोग इसे व्यक्तिगत आजादी से भी जोड कर देखते हैं, पर ऐसी आजादी किस काम की जो युवा पीढी को दिशाहीन कर दे। यह चलन पूरी तरह स्त्री विरोधी है। जब कभी ऐसा रिश्ता टूटता है तो उसका खमियाजा स्त्री को ही भुगतना होता है। सच्चाई यह है कि युवा पीढी शादी की जिम्मेदारियों से बचने के लिए लिव-इन का सहारा लेती है।
कोई बुराई नहीं है इसमें
अनामिका, ग्रेटर नोएडा
किसी भी आजाद देश के नागरिकों को इतनी आजादी तो होनी ही चाहिए कि वे अपनी जिंदगी अपने ढंग से गुजार सके। इसलिए मेरे विचार से लिव-इन में कोई बुराई नहीं है। आज की स्त्रियां शिक्षित और आत्मनिर्भर हैं। अगर ऐसे रिलेशनशिप से उनका ब्रेकअप हो भी जाता है तो इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। यह व्यवस्था व्यक्तिगत आजादी का सम्मान करती है और पूरी तरह समानता पर आधारित है। इसे किसी भी दृष्टि से स्त्री-विरोधी नहीं कहा जा सकता। तलाक के बढते मामले विवाह की विफलता का सबसे बडा प्रमाण हैं। बेमेल शादी करके तलाक लेने से बेहतर है कि लिव-इन के जरिये रिश्ते को परखने के बाद उसे अपनाया जाए।
विशेषज्ञ की राय
अगर हम बिना किसी पूर्वाग्रह के देखें तो हमें खुद महसूस होगा कि हमारा समाज तेजी से बदल रहा है। सूचना और संचार माध्यमों ने पूरी दुनिया को करीब लाने का काम किया है। इसलिए अपने देश के युवाओं के अनुभवों का दायरा बढा है। उन्हें विदेशी संस्कृति से भी घुलने-मिलने का अवसर मिल रहा है। इसलिए उनकी सोच में बदलाव आना स्वाभाविक है। शादी या लिव-इन किसी भी इंसान के लिए पूरी तरह व्यक्तिगत मामला है। आज की युवा पीढी अपनी आजादी की कीमत पहचानती है और उसे किसी भी हाल में खोना नहीं चाहती। इसीलिए आज के माता-पिता भी अपनी युवा संतानों पर जबरन अपना निर्णय नहीं थोपते। जहां तक पाठिकाओं के विचारों का सवाल है तो मैं बुजुर्ग पाठिका सरस्वती शर्मा की बातों से असहमत हूं। मेरे विचार से लिव-इन में अनैतिकता जैसी कोई बात नहीं है। युवा पाठिका अनामिका का कहना बिलकुल सही है कि यह किसी इंसान की आजादी से जुडा मुद्दा है। निश्चित रूप से लिव-इन शादी के विकल्प के रूप में उभर कर सामने आ रहा है, लेकिन विवाह की अहमियत को भी नकारा नहीं जा सकता।
डॉ. अशुम गुप्ता, मनोवैज्ञानिक
सखी प्रतिनिधि
