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    आदिवासियों की जीवन रेखा है सरना धर्म

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    Updated: Sun, 03 Feb 2013 02:50 AM (IST)

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    जागरण संवाददाता, राउरकेला :

    आदिवासियों की हासा , भाषा तथा संस्कृति की सुरक्षा के लिए काम करने वाले संगठन आदिवासी सेंगेल अभियान की एक महत्वपूर्ण बैठक शनिवार को पंथ निवास में आयोजित हुई। अभियान के अध्यक्ष रामचंद्र हांसदा की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में आदिवासियों को अपना अस्तित्व बचाने के लिए

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    हासा तथा संथाली, हो, मुंडा, कुडुख भाषा को सुरक्षित रखने पर जोर दिया गया।

    इस बैठक में पारसी जीतकारिया दिशोम गोमके पूर्व सांसद सलखान मुरमु ने आदिवासियों की समस्या तथा इसके समाधान करने को लेकर विभिन्न कार्य पद्धति पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि आदिवासियों को बचाने के लिए उनकी भाषा(जमीन), उनकी भाषा संथाली, हो, मुंडा, कुडुख आदि भाषाओं की रक्षा करनी होगी। उन्होंने सरना धर्म को आदिवासियों की जीवन शैली बताते हुए कहा कि उनकी जीवन शैली व संस्कृति को लोप होने नहंीं दिया जाएगा। क्योंकि यह ही आदिवासियों की जीवन रेखा है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार जीवन बचाने को आक्सीजन जरूरी होता है, उसी प्रकार आदिवासियों की हासा, भाषा व संस्कृति बचने से ही उनका अस्तित्व बचेगा। बैठक में जेडीपी के केंद्रीय महासचिव बुढ़ान मरांडी ने स्वागत भाषण दिया। इस बैठक में अन्य लोगों में अखिल भारतीय सारना धर्म परिषद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र मांझी, पनत पारगाना बाइतू मांझी, अखिल भारतीय संथाली लेखक परिषद के अध्यक्ष भादुराम सोरेन, नरेंद्रनाथ हेम्ब्रम ने भी वक्तव्य रखा। इस अवसर पर वास्ता मुरमु, गोविंद हांसदा, भादो मुरमु, जगत मुरमु, जगदीश मुरमु, सुधीर मरांडी, सिद्धेश्वर मुरमु, कारिया सोरेन, गुलिया आदि शामिल थे। अंत में सुधीर मरांडी ने धन्यवाद दिया।

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