यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 02, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
मानवाधिकार आयोग को भी कर रहे गुमराह
जागरण संवाददाता, गोरखपुर : पूर्वाचल में हर साल हजारों मासूमों की जान लेने वाले इंसेफ्लाइटिस के

जागरण संवाददाता, गोरखपुर :
पूर्वाचल में हर साल हजारों मासूमों की जान लेने वाले इंसेफ्लाइटिस के नियंत्रण व इलाज का ठोस उपाय करने की बजाय एक बार फिर आधारहीन दावों का दौर शुरू हो गया है। सीजन से पहले 369 मरीजों की भर्ती व 71 मौतों के बावजूद अधिकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी गुमराह करने में लगे हैं।
चाहे नियंत्रण केंद्र बनाने का मामला हो या फिर जापानी इंसेफ्लाइटिस टीकाकरण, इलाज या कोई अन्य मुद्दा, आयोग के हर सवाल का गोलमोल जवाब दिया गया। आयोग ने शासन से सवाल किया था कि इंसेफ्लाइटिस के इलाज के सबसे बड़े केंद्र गोरखपुर मेडिकल कालेज में हर साल तीन हजार से अधिक मरीज आते हैं, पर यहां इलाज करने वाले डाक्टर, नर्स वार्ड ब्वाय व सफाई कर्मचारी नियमित नहीं हैं। हर साल संविदा पर भर्ती होती है। वेतन का वजट भी अनियमित है। इस वजह से हर साल बहुत से डाक्टर व कर्मचारी नौकरी छोड़ देते हैं। दवा व जरूरी उपकरणों के अनुरक्षण के लिए बजट नहीं है। जवाब में कहा गया है कि मेडिकल कालेज चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधीन आता है। इसको देखते हुए महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा ने इस संबंध में कार्रवाई के लिए पत्र भेजा गया है। क्या कार्रवाई हुई है इस पर तो चर्चा ही नहीं की गई है। इंसेफ्लाइटिस मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए अलग एंबुलेंस की व्यवस्था पर बताया गया है कि 102 व 108 नंबर के एंबुलेंस हैं। आयोग ने कहा है कि इंसेफ्लाइटिस प्रभावित जिलों के सभी पीएचसी, सीएचसी को इंसेफ्लाइटिस मरीजों के इलाज के लिए चौबीस घंटे सक्षम बनाने के लिए चिकित्सकों, कर्मचारियों, बेड व वेंटीलेटर की व्यवस्था की जाए। जवाब में बताया गया है कि गोरखपुर-बस्ती मंडल के 104 स्वास्थ्य केंद्रों को इंसेफ्लाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर के रूप में विकसित किया गया है। उद्देश्य है कि मरीजों को तीस मिनट के भीतर यहां पहुंचाया जाए। यह भी बताया गया कि सात जिलों व ओपेक चिकित्सालय कैली में दस बेड का आइसीयू है। लेकिन सच यह है कि बीमारी से सर्वाधिक प्रभावित गोरखपुर जिला अस्पताल में भी आइसीयू क्रियाशील नहीं है। इंसेफ्लाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर की बदहाली किसी से छुपी नहीं है। समय से डाक्टर तक नहीं मिलते। आयोग ने पीने के पानी के लिए इंडिया मार्क हैंडपंप स्थापित करने, खराब हैंडपंपों को रिबोर करने व पेयजल योजनाओं को विशेष अभियान चलाकर पूरा करने की बात कही है। जवाब में बताया गया है कि दोनों मंडलों में 18295 इंडिया मार्का हैंडपंप टू तथा 2236 टैंक टाइप स्टैंड पोस्ट लगाए गए हैं। सच यह है कि हैंडपंप अब भी दूषित जल उगल रहे हैं, अधिकतर टीटीएसपी खराब हैं। आयोग ने निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को इलाज के दायरे में लाने और वहां भर्ती होने वाले मरीजों का रिकार्ड प्रतिदिन सीएमओ कार्यालय भेजने को कहा है जिससे सही आंकड़ा सामने आ सके। यह कहकर टाल दिया गया है कि इंसेफ्लाइटिस की सर्विलांस व्यवस्था मजबूत की जा रही है।
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जवाब देने में लग गए हफ्तों
मानस सेवा संस्थान के निदेशक राजेश मणि की याचिका पर मानवाधिकार आयोग ने शासन से बीते 25 मई को यह सवाल पूछे थे, लेकिन जवाब देने में हफ्तों लग गए। याचिकाकर्ता भी सरकार के जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। राजेश मणि का कहना है कि आयोग जब इस बारे में सवाल पूछेगा तो वह बिंदुवार अपनी बातें रखेंगे।
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