विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 10, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

श्रद्धालुओं के लिए जानलेवा है यह लापरवाही

By Gunateet OjhaEdited By:
Published: Sun, 10 Apr 2016 10:28 PM (IST)Updated: Sun, 10 Apr 2016 10:39 PM (IST)

विशेष मौकों पर धार्मिक स्थलों पर जुटने वाली लाखों लोगों की सुरक्षा का इंतजाम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ...और पढ़ें

News Article Hero Image

माला दीक्षित, नई दिल्ली। विशेष मौकों पर धार्मिक स्थलों पर जुटने वाली लाखों लोगों की सुरक्षा का इंतजाम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों को सवा दो साल पहले नोटिस जारी किया था। लेकिन अकर्मण्यता का आलम यह है कि इंतजाम तो दूर कई राज्यों ने नोटिस का जवाब तक दाखिल नहीं किया है। जवाब नहीं देने वाले छह राज्यों में उत्तर प्रदेश भी शामिल है, जहां आस्था का सबसे बड़ा कुंभ मेला आयोजित होता है। राज्यों की इस उदासीनता के चलते ही मामले में अभी तक प्रभावी सुनवाई शुरू नहीं हो पाई है।

25 अप्रैल को इस मामले में फिर सुनवाई होनी है। लेकिन केरल की ताजा घटना को देखते हुए याचिकाकर्ता मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध करेगा कि वह जल्द सुनवाई कर निर्देश जारी करे। अदालत में केस भले ही अटका हो लेकिन बदइंतजामी में लगातार इजाफा हो रहा है। रविवार को पुत्तिंगल मंदिर की आग ने सौ से ज्यादा लोगों को निगल लिया। ऐसे ही अक्टूबर 2013 को मध्य प्रदेश के रतनगढ़ स्थित मंदिर में हुई भगदड़ में115 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद वकील विनीत ढंढा ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने आपदा प्रबंधन के इंतजाम किए जाने की मांग की थी।

इस पर कोर्ट ने 19 नवंबर, 2013 को केंद्र सहित सभी राज्यों को नोटिस जारी किया था। इस मामले में आखिरी सुनवाई पिछले साल 14 अगस्त को हुई थी। केंद्र सरकार के पुरातत्व विभाग, आंध्र प्रदेश, गोवा, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, सिक्किम और उत्तर प्रदेश ने उस दिन तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया था। तब कोर्ट ने हलफनामा दाखिल नहीं करने वाले राज्यों को जवाब देने के लिए तीन सप्ताह का समय और दिया था। इससे पहले भी कोर्ट कई बार राज्यों को जवाब के लिए समय दे चुका था। केरल ने कोर्ट को भरोसा दिलाया था कि ऐसे मौकों पर जरूरी एहतियात बरते जाते हैैं और प्रशासन जरूरी इंतजाम भी करता है। लेकिन ताजा दुर्घटना ने उसके दावों की पोल खोल कर रख दी है। बंधन और भगदड़ रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट से दिशा-निर्देश देने की मांग की गई है।

अदालत को जवाब का इंतजार
कोई निर्देश देने से पहले सुप्रीम कोर्ट संबंधित पक्षों और सरकारों को सुनेगा। वास्तविक स्थिति जानना चाहेगा कि पहले से ऐसा कोई दिशा-निर्देश हैै कि नहीं है? अगर हैै तो उन्हें ठीक से कैसे लागू कराया जाए? इस सबके लिए प्रभावी सुनवाई की जरूरत है और प्रभावी सुनवाई सभी पक्षों द्वारा जवाब दाखिल होने के बाद ही शुरू हो सकती है।