यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 06, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
SP में पीढ़ी परिवर्तन संपूर्ण, टिकट बंटवारे में भी चलेगा अखिलेश का ही सिक्का
काफी लंबे समय तक समाजवादी कुनबे में चली तकरार अब खत्म होती हुई नजर आ रही है।

नई दिल्ली, [प्रशांत मिश्र]। उत्तर प्रदेश चुनाव का नतीजा जो भी आए प्रदेश की जनता यह मान चुकी है कि समाजवादी पार्टी के निर्णायक मुख्तार अखिलेश यादव ही हैं। यही कारण है कि देर से ही सही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे नेताजी मुलायम सिंह यादव और उनके छोटे भाई व प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव को भी समझ आने लगा है कि अखिलेश के बिना उनकी मीटिंग हो या रैली वह फीकी है।
खुद से आश्वस्त अखिलेश ने यह पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि कोई साथ चले या न चले, वह अकेले ही रथ लेकर निकल जाएंगे। उसी संकल्प के साथ तीन नवंबर को वह रथ लेकर निकल गए तो सपा परिवार के सभी वरिष्ठ लोगों को उनके रथ के पीछे चलना पड़ा।
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संकेत स्पष्ट है कि पीढ़ी का बदलाव अब पूरी तरह अपने स्वरूप में आ चुका है। थोड़ा बहुत कुछ बचा हुआ है तो वह भी चुनाव के बाद ठोस रूप में दिखेगा। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में सपा के एकमात्र चेहरे अखिलेश हों और शिवपाल दिल्ली की राजनीति में मुलायम के सहायक।
पिछले एक महीने में सपा के अंदर जिस स्तर पर और जितनी ज्यादा उथलपुथल रही उसके बाद स्थिति सामान्य होने में काफी लंबा वक्त लगेगा यह स्वाभाविक है। लेकिन एक मायने में सपा ने चुनाव से परे एक बड़ी गुत्थी संभवत: हमेशा के लिए सुलझा ली है। सपा में नेताजी तो एक ही है लेकिन गुत्थी थी- नेता कौन? दरअसल यह सवाल भी खुद सपा का ही बनाया हुआ था। अखिलेश के शासनकाल के पहले साढ़े तीन -चार साल तक जिस तरह प्रशासन में हस्तक्षेप हुआ उसके कारण ही यह स्थिति पनपी थी। लेकिन इस उहापोह के बाद जो कुछ बाहर आया है वह प्रदेश की राजनीति के लिए एक नई आस जरूर लाया है।
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उत्तराधिकार परिवार में बेटे के पास ही आता है यह सर्वमान्य है। सपा के रजत जयंती समारोह में चाचा शिवपाल यादव के मन की टीस भले ही दिखी हो लेकिन उन्होंने भी च्स सच्चाई को मान ही लिया। पर अखिलेश के मामले में जो अलग बात रही वह यह है कि उसने उत्तराधिकार को अर्जित कर लिया है। अपने पौरुष और अपनी ईमानदारी से उन्होंने खुद को जनता और पार्टी कार्यकर्ता के सामने नए जमाने का 'नेता' साबित कर दिया।
पीढ़ी का ऐसा बदलाव हुआ जिसमें नेतृत्व का केवल पिता से पुत्र के पास स्थानांतरण नहीं हुआ बल्कि उत्कृष्टता साबित की गई हो। पीढ़ी का यह बदलाव योग्यता के आधार पर हुआ है। मंत्रिमंडल से कुछ लोगों को हटाने के बाद अपने फैसले पर अडिग रहना और फिर पार्टी से निकाले जाने के बाद भी अपनी पसंद के मंत्री पवन पांडे के साथ खड़े रहने जैसे फैसले ने कार्यकर्ताओं तक को यह संदेश दे दिया कि उनका निर्णय आखिरी होगा।
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अखिलेश अब चल पड़े हैं। रथयात्रा पर भी और न्याय यात्रा पर भी। वह पूरे प्रदेश की जनता से पूछेंगे कि कौन सी राजनीति अच्छी है- माफिया और अपराधियों के साथ वाली या जाति, धर्म और विकास वाली? वह कहेंगे- 'हमने विकास किया, जिडिटल यूपी बनाया और हां, अगर अपराधियों को बाहर का रास्ता दिखाया तो क्या गलत किया? मुख्तार अंसारी के साथ हमने हाथ नहीं मिलाया तो क्या गलत किया? अखिलेश का यही बयान उनकी लकीर को मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव की लकीर से लंबा करता है।
दरअसल अखिलेश के साथ न सिर्फ नेतृत्व का बदलाव हुआ है बल्कि समाजवादी पार्टी की दिशा भी बदली है। उत्तर प्रदेश की अहम पार्टी में हुए इस बदलाव का असर लंबा दिखेगा। प्रदेश से लेकर केंद्र की राजनीति तक।यह माना जाने लगा है कि चुनाव में अब टिकट बंटवारे में भी आखिरी फैसला अखिलेश का ही हो। संभवत: पहले बंट चुके कुछ टिकट भी बदले जाएं। जबकि चुनाव बाद संभवत: शिवपाल यादव दिल्ली की राजनीति में सक्रिय नजर आएं। वह राज्यसभा में आकर शायद रामगोपाल यादव की भूमिका में नेताजी की मदद करें।
