यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 04, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
राज्यवर्धन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पार्श्वनाथ को दी कड़ी चेतावनी
राज्यवर्धन राठौड़ ने 2006 में वहां फ्लैट बुक कराया था और उसके 70 लाख रुपये का भुगतान भी किया था।

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। सुप्रीम कोर्ट ने पार्श्वनाथ डवलपर्स को चेतावनी दी है कि खेल मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ को बुक फ्लैट का पैसा लौटाने के लिए जारी पोस्ट डेटेड चेक बाउंस हो गए तो उसे न्यायालय की अवमानना कार्रवाई झेलनी होगी। इसके अलावा जुर्माना भी लगेगा। यह मामला पार्श्वनाथ के गुड़गांव स्थित प्रोजेक्ट एक्जॉटिका का है।
राज्यवर्धन राठौड़ ने 2006 में वहां फ्लैट बुक कराया था और उसके 70 लाख रुपये का भुगतान भी किया था। उन्हें 2008-09 में फ्लैट मिलना था लेकिन अभी तक नहीं मिला। जिसके बाद राठौड़ ने कोर्ट में केस किया जो सुप्रीम कोर्ट पहुंच गयाा। कोर्ट ने बिल्डर को फ्लैट देने का आदेश दिया लेकिन दोनों पक्षों के बीच बात नहीं बन पायी। राठौड़ ने फ्लैट को रहने के लिए अनुपयुक्त बताकर वापस कर दिया और बिल्डर ने उसके बदले उन्हें पांच पोस्ट डेटेड चेक जारी किये। सोमवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने राठौड़ से कहा कि अगर चेक का समय पर भुगतान नहीं मिलता है तो वे फिर कोर्ट आ सकते हैं।
रियल्टी एक्ट की वैधानिकता जांचेगा हाईकोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बांबे हाई कोर्ट से कहा है कि वह रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलेपमेंट एक्ट (रेरा) की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का जल्द निपटारा करे। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की स्थानांतरण याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बेहतर होगा कि पहले बांबे हाई कोर्ट वहां संबंधित याचिकाओं का निपटारा करे। उसका फैसला आने के बाद अन्य हाई कोर्ट भी अपने यहां लंबित याचिकाओं का निपटारा करें। कोर्ट ने इसके साथ ही अन्य उच्च न्यायालयों में लंबित याचिकाओं की सुनवाई पर तब तक के लिए रोक लगा दी।
इससे पहले केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कहा था कि देश भर के उच्च न्यायालयों में कुल 20 याचिकाएं लंबित हैं जिनमें रेरा को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट सभी मामले अपने यहां ट्रांसफर कर ले या फिर किसी एक हाईकोर्ट भेज दे। रेरा कानून में रियल एस्टेट सेक्टर को रेगुलेट करने के नियम तय किये गये हैं जिसमें निवेशकों, बिल्डरों और सभी संबंधित पक्षकारों के हित संरक्षित किये गये हैं। कई बिल्डरों और डवलपर्स ने इसे विभिन्न उच्च न्यायालयों में चुनौती दी है।
