यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 11, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सबरीमाला मंदिर मामला: संवैधानिक तौर पर अस्वीकार्य महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी
सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर बोर्ड से पूछा कि संवैधानिक तौर पर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी कैसे स्वीकार की जा सकती है।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर बोर्ड से पूछा कि संवैधानिक तौर पर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी कैसे स्वीकार की जा सकती है। संविधान लिंग के आधार पर भेदभाव की इजाजत नहीं देता तो फिर किसी को इस आधार पर मंदिर में प्रवेश से कैसे रोका जा सकता है। महिलाओं के संवैधानिक अधिकार का मुद्दा उठाते हुए कोर्ट ने कहा कि क्या कोई परंपरा संवैधानिक अधिकारों से ऊपर हो सकती है। कोर्ट ने ये भी कहा कि भारतीय संस्कृति में माता का स्थान सबसे ऊपर है। मामले में बुधवार को फिर सुनवाई होगी।
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को ये टिप्पणियां केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 वर्ष से 50 वर्ष तक की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के मामले में सुनवाई के दौरान कीं। इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन ने याचिका दाखिल कर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश दिलाए जाने की मांग की है।
पीठ ने कहा कि याचिका में लिंग आधारित भेदभाव का मुद्दा उठाया गया है। कोर्ट यह नहीं देखेगा कि इस पर ज्यादातर लोगों की राय क्या है बल्कि कोर्ट संवैधानिक प्रावधानों के के आधार पर विचार करेगा। मंदिर बोर्ड के पास ऐसे कौन से अधिकार हैं जिसके तहत वे महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी लगा सकते हैैं। मंदिर बोर्ड के वकील केके वेणुगोपाल ने कहा कि सबरीमाला मंदिर के भगवान ब्रह्मïचारी हैं महिलाओं की मौजूदगी से ब्रह्मïचर्य भंग होता है इसलिए महिलाओं को वहां प्रवेश की इजाजत नहीं है। उन्होंने कहा कि केरल हाई कोर्ट मंदिर बोर्ड के इस अधिकार पर अपनी मुहर लगा चुका है और हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई है।
इस पर पीठ ने कहा कि अगर वे ये तर्क स्वीकार भी कर लें तो क्या संविधान में इसकी इजाजत है। इस पर केरल सरकार के वकील ने कहा कि महिलाओं के प्रवेश पर पूरी तरह रोक नहीं है सिर्फ 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक है। इस बीच पीठ ने जानना चाहा कि क्या किन्नरों को मंदिर में प्रवेश की इजाजत है। जब ऊंची पहाड़ी पर चढऩे और 41 दिन तक ब्रह्मïचर्य में पूजा करने का तर्क दिया गया तो कोर्ट ने कहा कि क्या आप किसी महिला को एवरेस्ट पर चढऩे से रोक देंगे।
कोर्ट ने भारतीय संस्कृति में महिलाओं का स्थान सबसे ऊंचा होने का तर्क देते हुए कहा कि अगर माता, पिता, गुरू और कुल पुरोहित चार लोग बैठे हों तो किसे सबसे पहले नमन किया जाएगा। पीठ ने स्वयं ही जवाब दिया पहले माता, फिर पिता, कुल गुरू और कुल पुरोहित को नमन किया जाएगा। भारतीय संस्कृति में मां सर्वप्रथम है।
याचिकाकर्ता के वकील रवि प्रकाश गुप्ता ने महिलाओं पर पाबंदी का विरोध करते हुए कहा कि हिन्दू धर्म में महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर रोक नहीं लगाई गई है। यहां तक कि सबरीमाला मंदिर में भी राज परिवार की महिलाओं को प्रवेश मिलता था।
एक अन्य महिला संगठन की ओर से पेश इंद्रा जयसिंह ने महिलाओं पर रोक का विरोध करते हुए कहा कि यहां मामला मंदिर प्रबंधन या ट्रस्ट में हक मांगने का नहीं है जिससे कि धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का हनन होता हो। यहां मामला मंदिर में जाकर पूजा करने के हक का है और अनुच्छेद 25 के तहत सभी नागरिकों को अपने धार्मिक विश्वासों को मानने और उनका पालन करने का अधिकार मिला है, सभी में महिलाएं भी आती हैं।
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