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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 10, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जीत की हार, राष्ट्रपति शासन के आसार

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Published: Tue, 10 Dec 2013 12:38 AM (IST)Updated: Tue, 10 Dec 2013 10:27 AM (IST)

दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की संभावना लगातार प्रबल होती जा रही है। सबसे बड़े दल भाजपा और संख्या ...और पढ़ें

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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की संभावना लगातार प्रबल होती जा रही है। सबसे बड़े दल भाजपा और संख्या बल के लिहाज से दूसरे नंबर पर आई आम आदमी पार्टी (आप) ने सरकार बनाने से प्रत्यक्ष तौर पर इन्कार कर दिया है। आप ने तो दूसरे विधानसभा चुनाव की तैयारी भी शुरू कर दी है। इसका परिणाम यह होने जा रहा है कि नए चुने गए विधायक विधानसभा की सदस्यता की शपथ नहीं ले पाएंगे। उन्हें तनख्वाह व भत्ते तक नहीं मिलेंगे। इस बीच, दिल्ली की चौथी विधानसभा को भंग कर दिया गया है।

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राजनिवास में हलचल तेज

दिल्ली के ताजा राजनीतिक परिदृश्य के मद्देनजर गेंद अब उपराज्यपाल नजीब जंग के पाले में है। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो उपराज्यपाल के निर्देश पर सोमवार को दिल्ली सरकार के कानून विभाग के उच्चाधिकारियों तथा दिल्ली विधानसभा सचिवालय के अधिकारियों के बीच बातचीत हुई है।

इसका लब्बोलुआब यह है कि जैसे ही दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी विजय देव दिल्ली विधानसभा के लिए चुने गए विधायकों के नाम अधिसूचित करेंगे और संबंधित सूची उपराज्यपाल को सौंपेंगे, उसके बाद राजनिवास पांचवीं विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी कर देगा।

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, पहले मुख्यमंत्री व उनके मंत्रिमंडल को शपथ दिलाई जाती है और मंत्रिमंडल की सिफारिश के बाद उपराज्यपाल विधानसभा की बैठक बुलाते हैं। फिर अस्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति होती है और वही अध्यक्ष सभी चुने गए विधायकों को शपथ दिलाते हैं।

सबसे बड़े दल को पहले मौका

कानूनी जानकारों की मानें तो उपराज्यपाल इस बात के लिए बाध्य नहीं हैं कि वे सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्योता दें। अगर उन्हें ऐसा लगता है कि कोई भी दल स्थायी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है तो वह सीधे राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं। लेकिन अब तक परंपरा यही रही है कि सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जाता है।

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं कि उपराज्यपाल पहले सबसे बड़े दल, उसके बाद दूसरे सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए कह सकते हैं। यदि ये दोनों दल सरकार बनाने से इन्कार कर दें, तब उनके सामने विधानसभा को फौरी तौर पर निलंबित अवस्था में रखकर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने का विकल्प खुला है।

मुश्किल है बहुमत जुटाना

दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव सुदर्शन शर्मा कहते हैं कि दिल्ली की ताजा स्थिति दिलचस्प है। अब तक तो यही देखने में आया है कि राजनीतिक दल सरकार बनाने के लिए हर तरीके का प्रयास करते हैं। लेकिन यहां तो कोई सरकार बनाने को तैयार ही नहीं है। दोनों बड़े दल विपक्ष में बैठने की बात कर रहे हैं।

विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि उपराज्यपाल जंग राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश करने से पहले भाजपा व आप के नेताओं से जरूर बातचीत करेंगे और उसके बाद ही आगे कदम उठाएंगे। लेकिन जिस प्रकार भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार डॉ. हर्षवर्धन व आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल लगातार विपक्ष में बैठने की बातें कर रहे हैं, उसे देखते हुए इस बात की संभावना कम है कि नई सरकार आसानी से बन पाएगी।

भाजपा नहीं उठाएगी खतरा

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि कुछ महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर 31 सदस्यों वाली भाजपा चार विधायकों की जुगाड़ के लिए कांग्रेस या आप को तोड़ने की कोशिश नहीं करेगी। इसका राजनीतिक गलत राजनीतिक संदेश जा सकता है। वहीं आप किसी भी स्थिति में कांग्रेस या भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने को तैयार नहीं है, तो कांग्रेस भी बिना मांगे किसी को समर्थन देने के लिए तैयार नहीं है।

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