यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 18, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सियासी बदलाव का सबब बनेगा जाटों का गुस्सा
हिंसाग्रस्त शाहपुर से सड़क मार्ग के जरिये सिसौली तक के सफर में पसरे सन्नाटे में इन दिनों कई सवाल उमड़-घुमड़ ...और पढ़ें

मनोज झा, मेरठ। हिंसाग्रस्त शाहपुर से सड़क मार्ग के जरिये सिसौली तक के सफर में पसरे सन्नाटे में इन दिनों कई सवाल उमड़-घुमड़ रहे हैं। जातीय खापों के असर वाले इस इलाके के रहनुमाओं से लेकर आम लोगों में इन दिनों एक खास किस्म की बेचैनी देखी जा सकती है। यह बेचैनी जाट लैंड के दिलोदिमाग में बदलाव के संकेत भी दे रही है। मुजफ्फरनगर पिछले दिनों नफरत और हिंसा के जिस रक्तचक्र से गुजरा है, उसने जाट लैंड की यह बेचैनी और बढ़ा दी है।
सांप्रदायिक हिंसा के भयावह दौर से उबर रहे मुजफ्फरनगर और उसके सीमावर्ती पूरे इलाके को आज सियासत और उसके किरदारों से बेशुमार शिकायतें हैं। मोटे तौर पर पश्चिमी उत्तार प्रदेश की इस पंट्टी पर जाटों का शुरू से दबदबा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने इस बिरादरी की सियासी अस्मिता को न सिर्फ ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि उन्होंने यहां की मेहनतकश माटी को समृद्धि की राह भी दिखाई। चौधरी साहब की यह विरासत उनके पुत्र अजित सिंह के पास आई तो जरूर, लेकिन वह इसे कितना संभाल पाए, आज यह एक बड़ा प्रश्न बन गया है।
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परंपरागत रूप से जाट समुदाय अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के वोटर माने जाते हैं। लेकिन अब हालिया सांप्रदायिक हिंसा ने जाटों की इस निष्ठा को मानो हिलाकर रख दिया है। दंगे का दर्द बांटने जिले में मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक आए, लेकिन जाटों की बेचैनियां घटने के बजाय बढ़ गई हैं। बालियान खाप से लेकर गठवाला, बत्ताीसा, लठियान, खादर, देश आदि खापों के चौधरियों में हुकूमत के बेगाने रवैये को लेकर जबरदस्त बेचैनी है। जातीय स्वाभिमान पर मर-मिटने वाली इस बिरादरी को इस बात का भी घोर मलाल है कि उनके नेता चुप बैठे हैं।
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बालियान खाप के मुखिया नरेश टिकैत के गांव सिसौली के बलजोर सिंह कहते हैं कि रालोद ने मुसीबत में हमारा साथ नहीं दिया। किसान यूनियन के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष दरियाव सिंह का दर्द है कि जाटों की न तो मुख्यमंत्री ने सुनी न प्रधानमंत्री ने। हम इस बार अलग रास्ता अख्तियार करेंगे। गठवाला खाप से जुड़े डॉ. बाबूराम मलिक भी शासन के रवैये को लेकर बेहद गुस्से में हैं। सिसौली से आगे सोरम में भी जाटों की बड़ी आबादी है। यहां भी हुकूमत और अजित सिंह को लेकर बड़ा असंतोष है। पूर्व प्रधान सुधीर चौधरी, डॉ. गजेंद्र सिंह, छात्र विपिन चौधरी, पूर्व प्रधान अंजना चौधरी सभी एक सुर में कहते हैं कि जाटों का बहुत अपमान हुआ। कोई भी हमारे जख्मों पर मरहम लगाने नहीं आया। हम हिंदुओं की रक्षा करने वालों को चुनेंगे। राष्ट्रीय इंटर कॉलेज, शाहपुर के पूर्व अध्यक्ष और काकड़ा निवासी भोपाल सिंह कहते हैं कि जाटों की बहुत बेइज्जती हुई है।
हिंसा प्रभावित इस इलाके से दूर शामली के जाट बहुत इलाके का मिजाज भी बदलाव का यही लावा उगल रहा है। ऊन कस्बे के समाजसेवी चंद्रपाल चिकारा ने साफ कहा कि अपमानित जाट भाजपा का साथ देंगे। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की शोधार्थी डॉ. गरिमा कहती हैं कि जाट ही क्यों, इस देश का भविष्य नरेंद्र मोदी के हाथों में सुरक्षित है। इसी प्रकार दरगाहपुर के शांतारात चौधरी, सिकंदरपुर के कालूराम, बिल्लू प्रधान जैसे आम जाट भी शासन-प्रशासन से लेकर रालोद नेतृत्व से बेहद आहत हैं।
बहरहाल, जाट बहुल इन तमाम खापों का सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि इस पूरी बेल्ट में बदलाव की यह छटपटाहट पश्चिम में राजनीति की नई इबारत लिखेगा।
चौधरियों की जुबानी
लोकसभा चुनावों में हिंदुओं का रुझान उसी की तरफ रहेगा, जो उनकी सुनेगा। लखनऊ और दिल्ली की मौजूदा हुकूमत का रवैया भेदभावपूर्ण है।
-चौधरी नरेश टिकैत, बालियान खाप
मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री ने एक पक्ष सुना। हम सरकारों के रवैये से असंतुष्ट हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को इस्तीफा दे देना चाहिए। वह मुख्यमंत्री बनने लायक नहीं हैं।
-बाबा हरिकिशन सिंह मलिक, गठवाला खाप
सब मुसलमान वोट हासिल करने की राजनीति है। वोटों की राजनीति करने से कुछ नहीं मिलने वाला। हिंदू समझ गया है। रालोद से भी कोई उम्मीद नहीं बची। इस बार सबका रुझान मोदी की तरफ लग रहा है।
-चौ. बाबा सूरजमल, बत्ताीसा खाप
सपा और कांग्रेस के नेता आए और सिर्फ मुस्लिमों की सुनकर चले गए। परेशान और पीड़ित तो हिंदुओं में भी है। उनकी भी सुननी चाहिए थी। रालोद के किसी भी नेता ने कोई हमदर्दी नहीं दिखाई।
-चौ. संजय कालखंडे, कालखंडे खाप
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